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सौन्दर्य लहरी में प्रयुक्त तिङन्त क्रियापदों का विवेचन | Original Article

Sunita Kumari*, in Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education | Multidisciplinary Academic Research

ABSTRACT:

संस्कृत भाषा के क्रियापदों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है तिङन्त क्रियापद एवं कृदन्त क्रियापद। ये दोनों प्रकार के क्रियापद दो सार्थक इकाईयों से बनते हैं। प्रथम इकाई को धातु व द्वितीय इकाई को तिङ् अथवा कृत् प्रत्यय कहते हैं। तिङन्त क्रियापद काल या वृत्ति, वाच्य, पुरूष, वचन व पद से अन्वित होने के कारण अनेक प्रकार के होते हैं। संस्कृत भाषा में काल के तीन भेद हैं- यथा वर्तमान काल, भूतकाल एवं भविष्यत काल। पाणिनि ने काल बोधक व वृत्ति बोधक तत्वों को काल की संज्ञा दी है तथा इनकी संख्या दस मानी जाती है। लट्, लिट्, लुट, लृट्, लेट्, लोट्, लङ्, लिङ् (वि0लि0, आ0लि0) लुङ्, लृङ्। इनमें पांचवा लेट् लकार केवल वेद में ही मिलता है। लिङ् लकार को दो भागों में बांटा जाता है। जब विधि निमंत्रण, आमंत्रण, अधीष्ट, संप्रश्न, प्रार्थना अर्थों में इसका प्रयोग होता है तब इसे वि0लि0 लकार कहते हैं। परंतु जब इसका प्रयोग आशीर्वाद अर्थ में होता है तब यह आशीर्लिङ् लकार होता है।