हिन्दी की रीतिकालीन कविता: पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता
A Reassessment of Hindi Poetry in the Ritikaal Era
by Meena Kumari*,
- Published in Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education, E-ISSN: 2230-7540
Volume 16, Issue No. 4, Mar 2019, Pages 531 - 535 (5)
Published by: Ignited Minds Journals
ABSTRACT
हिन्दी साहित्य के इतिहास का पूर्व मध्यकाल भक्त-कवियों का काल था, जिनकी अमृतमयी वाणी का प्रभाव जन-जन पर पड़ा था। उनके काव्य में आध्यात्म रस था, संगीत की स्वरलहरी थी और साथ ही निरहंकार व्यक्तित्व का था निमज्जन। वे ईश्वर के गुणगान में मस्त थे। वे त्यागी-महात्मा किसी लौकिक एषणा से काव्य-रचना में प्रवृत्त नहीं हुए थे। वे केवल आत्मतुष्टि- ‘स्वान्तः सुखाय’ के लिये काव्य-रचना करते थे। संतों-भक्तों का काव्य मनुष्य-जीवन को उदात्व, निष्कलुष और ईश्वरोन्मुख करने वाला काव्य था- उसे आदर्श भावभूमि पर स्थापित करने वाला काव्य था, वह जीवन का एक व्यापक व्याख्यान था।
KEYWORD
हिन्दी, रीतिकालीन, कविता, पुनर्मूल्यांकन, भक्त-कवियों, आध्यात्म, संगीत, निरहंकार, काव्य-रचना, संतों-भक्तों, भावभूमि, व्याख्यान