डॉ. हरिशरण वर्मा के नाटकों में सामाजिक युगबोध
by Nisha Kumari*,
- Published in Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education, E-ISSN: 2230-7540
Volume 16, Issue No. 4, Mar 2019, Pages 755 - 758 (4)
Published by: Ignited Minds Journals
ABSTRACT
सामाजिक युगबोध की अर्थ एंव परिभाषा को समझने से पहले हमें युगबोध का अर्थ समझ लेना चाहिए। युग+बोध यह दो शब्दो के मेल से बना है कुछ तो मानते है की पूर्ण शब्द का अर्थ एक ही है लेकिन यह शब्द एक दूसरे के पूरक होते हूए एक-दुसरे से भिन्न है जैसे युग शब्द का अर्थ यदि पाश्चात्य या अंग्रेजी मे देखा जाए तो टाईम, पीरियड़ तथा ‘एंज’ कहा जाता है अंग्रेजी साहित्य में किसी साहित्य प्रवृति के बने रहने तक के टाईम को ‘एज’ कहा जाता है। “युग काल- प्रभाव का एक भाग है जो किसी न किसी रूप में जुड़ा है। आचार्य रामचन्द्र वर्मा के कोष में भी यही अर्थ है”1- इसका अर्थ ‘बृहस्पति’ का एक राशि में स्थिर रहने को पंचवर्शीय काल भी होता है।
KEYWORD
डॉ. हरिशरण वर्मा, नाटक, सामाजिक युगबोध, युगबोध, युग, बोध, पूर्ण शब्द, टाईम, पीरियड़, एंज