ममता कालिया के कहानी संग्रह ‘मुखौटा में नारी अस्तित्व की तलाश’
An exploration of the struggle for women's existence in the collection of short stories 'Mukhauta' by Mamta Kalia
by Deepti Girhotra*, Dr. Gyani Devi Gupta,
- Published in Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education, E-ISSN: 2230-7540
Volume 16, Issue No. 6, May 2019, Pages 1334 - 1337 (4)
Published by: Ignited Minds Journals
ABSTRACT
साहित्य और समाज का संबंध, रचनाकारों द्वारा यथार्थ परिस्थितियों का आंकलन करना होता हैं। ममता कालिया के कहानी सग्रंह में नारी पात्र अस्तित्वहीन होकर अपने अस्तित्व की तलाश में लगातार संघर्ष कर रहे है। आज की नारी पुरूष के समक्ष ही नही अपितु अनेक क्षेत्रों में अपना वर्चस्च को स्थापित करने की तलाश में है। नारी ने अपनी मेहनत द्वारा अपने अस्तित्व को एक अलग पहचान दी है। वे परंपरागत रूढियों को तोड़कर आगे बढ़ रही हैं। वे किसी प्रकार का शोषण व अत्याचार को सहन नही कर रही हैं बल्कि अन्नाय के खिलाफ पूर्ण रूप से सघंर्ष करती हुई नजर आ आती हैं। ममता कालिया के कहानी संग्रह ‘मुखौटा’ में नारी अपने अस्तित्व की तलाश कर रही है जिसका वर्णन विभिन्न कहानियों द्वारा किया गया हैं। ममता कालिया के ‘मुखौटा’ कहानी संग्रह की कहानी ‘चिरकुमारी‘ में नारी अपने स्वतन्त्र विचारों द्वारा अस्तित्व को तलाश रही हैं। इसी कहानी सग्रंह की कहानी ‘प्रतिप्रश्न‘ में महिमा नायिका का अकेलेपन से झूझते हुए व अविवाहित कामकाजी नारी होते हुए भी विवादास्पद जीवन यापन करना। ‘उत्तर-अनुराग’ कहानी में ‘खन्नी आंटी’ का पति की बेवफाई को सहन करते हुए भी अपने अस्तित्व को कायम न कर पाना। ‘श्यामा’ कहानी में श्यामा नायिका अपने पति द्वारा अत्याचार व शोषण को सहन करती हुए अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील होना। ‘सीमा’ कहानी में नायिका ‘सीमा’ अपने द्वारा प्रताड़ित व दुखों को सहन करती हुई अपने अस्तित्व अर्थात अपने स्व की पहचान बनाने के लिए संघर्ष करना। इस शोध पत्र में ममता कालिया के कहानी संग्रह मुखौटा में नारी पात्र जो अस्तित्वहीन हुए, अपने अस्तित्व की तलाश में उन्हे जो संघर्ष करना पड़ा, सभी पहलुओं पर चिंतन करना ही इस शोध-पत्र का उद्देश्य है।
KEYWORD
ममता कालिया, कहानी संग्रह, मुखौटा में नारी अस्तित्व की तलाश, चिरकुमारी, प्रतिप्रश्न, उत्तर-अनुराग, खन्नी आंटी, श्यामा, सीमा, साहित्य और समाज