आदिवासी समुदाय की समस्याएँ एवं चुनौतियाँ पर एक लेख

Challenges and Misconceptions regarding Tribal Communities in Hindi Literature

by Mukesh Rani*, Dr. Navita Rani,

- Published in Journal of Advances and Scholarly Researches in Allied Education, E-ISSN: 2230-7540

Volume 16, Issue No. 6, May 2019, Pages 3677 - 3680 (4)

Published by: Ignited Minds Journals


ABSTRACT

हिन्दी उपन्यासों का आदिवासी जीवन पक्ष वैसा नहीं है जैसा गैर आदिवासी लोग उसे समझते हैं । वास्तविक चित्र गढ़े गए चित्र से बहुत अलग है। हालांकि आदिवासी विमर्श, ख्री विमर्श और दलित विमर्श लगभग साथ ही हिन्दी साहित्य में विमर्श के केंद्र में उपस्थित होते हैं, इसलिये ये तीनों अपनी विचारधारा और चिंतन से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। यहाँ यह कहने की जरूरत नहीं कि वर्तमान समय अस्मिताओं के उदय और उनके संघर्ष का समय है। आदिवासी समाज का इतिहास बहुत प्राचीन है, यह इतना ही प्राचीन है जितना मानव इतिहास आज के गैर-जनजातीय लोग प्रायः आदिवासी समाज और संस्कृति से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं, जिसके कारण उन्हें आदिवासी समाज के प्रति गलत घारणाओं और सूचनाओं ने घेर लिय है अब तक लोग आदिवासियों को बर्बर और जंगली समझते रहे हैं वास्तव में अपने को सभ्य समझने वाले कुंठित मानसिकता से ग्रसित लोगों ने स्वयं ही आदिवासियों के प्रति गलत धारणाएँ प्रचारित-प्रसारित कर अज्ञानता का परिचय दिया हैदुखद है कि हमारे संविधान में नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए एक से बढ़कर एक अधिनियम तो बनाये गए हैं, लेकिन जब उन अधिनियमों को आदिवासी समाज पर क्रियान्वित करने का समय आता है, तो वे अधिनियम महज छलावा साबित होते हैं इस लेख में आदिवासीयों के जीवन मे आने वाली समस्‍याओं की वि‍वरण किया है।

KEYWORD

आदिवासी समुदाय, समस्याएँ, चुनौतियाँ, हिन्दी उपन्यासों, आदिवासी जीवन, विमर्श, संघर्ष, आदिवासी समाज, संस्कृति, गलत धारणाएँ