भारत में
महिला सशक्तिकरण
के समक्ष सामाजिक
निर्योग्यताएं:
एक समाजशास्त्रीय
अध्ययन
अंजली
त्रिपाठी1*,
डॉ.
राजश्री
मठपाल2
1 शोध
छात्रा,
वनस्थली
विद्यापीठ,
राजस्थान
anjalitripathi435@gmail.com
2 सहायक
प्रोफेसर,
समाजशास्त्र
विभाग, वनस्थली
विद्यापीठ,
राजस्थान
सारांश: भारत में
महिला सशक्तिकरण
एक बहुआयामी सामाजिक
प्रक्रिया है, जो केवल
आर्थिक अवसरों
की उपलब्धता पर
निर्भर नहीं करती, बल्कि
सामाजिक संरचनाओं, सांस्कृतिक
मान्यताओं, पारिवारिक
नियंत्रण और लैंगिक
पूर्वाग्रहों
से भी प्रभावित
होती है। अतः प्रस्तुत
शोध-पत्र भारत
में महिला सशक्तिकरण
के समक्ष उपस्थित
सामाजिक निर्योग्यताओं
जैसे पितृसत्तात्मक
मान्यताएँ, शिक्षा
व स्वास्थ्य में
असमानता, आर्थिक
निर्भरता, लैंगिक
आधारित हिंसा, तथा जाति-वर्ग
आधारित भेदभाव
का समाजशास्त्रीय
विश्लेषण प्रस्तुत
करता है। उक्त
अध्ययन में द्वितीयक
स्रोतों, जैसे सरकारी
रिपोर्टों और अंतरराष्ट्रीय
सूचकांकों के आँकड़ों
का उपयोग किया
गया है। साथ ही
शोध को समाजशास्त्रीय
दृष्टि से समझने
हेतु विभिन्न सैद्धांतिक
परिप्रेक्ष्यों
को आधार बनाया
गया है जिसमें
पितृसत्ता सिद्धांत, नारीवादी
सिद्धांत, संघर्ष
सिद्धांत तथा कार्यात्मक
सिद्धांत जैसे
दृष्टिकोण शामिल
किए गए हैं। निष्कर्ष
से ज्ञात होता
है कि महिला सशक्तिकरण
की दिशा में प्रगति
के लिए केवल कानून
पर्याप्त नहीं, बल्कि
संरचनात्मक एवं
सांस्कृतिक परिवर्तन
भी आवश्यक हैं।
मुख्य
शब्द
महिला सशक्तिकरण, सामाजिक
निर्योग्यता,अवसरों
की समानता,महिला
स्वावलंबन
प्रस्तावना
महिला
सशक्तिकरण आधुनिक
समाजों में विकास
और सामाजिक न्याय
का मूल आधार है।
भारतीय समाज में
महिलाओं की स्थिति
ऐतिहासिक,
सांस्कृतिक
और सामाजिक कारणों
से अपेक्षाकृत
कमजोर रही है।
यद्यपि भारत में
शिक्षा,
स्वास्थ्य,
कानून
और रोजगार के क्षेत्र
में प्रगति देखी
गई है, फिर
भी महिलाओं के
वास्तविक सशक्तिकरण
में कई बाधाएँ
मौजूद हैं।
सशक्तिकरण
का अर्थ केवल अधिकार
देने भर से नहीं
है; इसका
संबंध महिलाओं
की स्वतंत्रता,
स्वायत्तता,
निर्णय
लेने की क्षमता
और संसाधनों पर
नियंत्रण से है।
परंतु भारतीय सामाजिक
संरचना विशेषकर
पितृसत्ता महिलाओं
को निजी तथा सार्वजनिक
दोनों क्षेत्रों
में सीमित करती
है। अतः प्रस्तुत अध्ययन का
उद्देश्य इन सामाजिक
निर्योग्यताओं
को समाजशास्त्रीय
संदर्भ में समझना
है।
साहित्य समीक्षा
भारतीय
समाज में महिलाओं
की स्थिति पर विस्तृत
साहित्य समय के
साथ यह दर्शाता
है कि पितृसत्तात्मक
संरचना,
सामाजिक
संस्थाएँ,
आर्थिक
निर्भरता और सांस्कृतिक
धारणाएँ महिलाओं
के पिछड़ेपन के
मूल कारण हैं।
दुबे
(1997) के अनुसार
भारतीय समाज में
लैंगिक असमानता
केवल घर के भीतर
ही नहीं,
बल्कि
सामाजिक,
आर्थिक
और धार्मिक संस्थाओं
द्वारा भी पुनरुत्पादित
होती है। उन्होंने
इस बात पर जोर दिया
कि महिला की भूमिका
को परंपरागत रूप
से घरेलू कार्यों
से जोड़कर देखा
जाता है,
जिससे
शिक्षा एवं निर्णय
लेने की स्वतंत्रता
सीमित रहती है।
कुमार
(2010) ने ग्रामीण
भारत पर केंद्रित
अध्ययन में पाया
कि महिलाओं के
श्रम का आर्थिक
मूल्य कम आँका
जाता है और अनौपचारिक
श्रम में संलग्न
होने के बावजूद
वे आर्थिक रूप
से निर्भर बनी
रहती हैं। महिलाओं
के योगदान को Þfamily
laborÞ के रूप में
लेबल कर देना उन्हें
अधिकारों और संसाधनों
पर दावे से वंचित
करता है।
नंदा
(2005) के शोध
में बताया गया
कि भारतीय सांस्कृतिक
मान्यताएँ जैसे
“कन्या की सुरक्षा“,
“इज्जत” और “त्याग”
की अपेक्षा महिलाओं
को उनके स्वयं
के निर्णयों से
दूर कर देती हैं।
उन्होंने विशेष
रूप से यह उल्लेख
किया कि लड़की होने
पर माता-पिता का
निवेश कम कर दिया
जाता है,
जिसका
प्रभाव शिक्षा,
पोषण
और स्वास्थ्य पर
पड़ता है।
बोस
और क्नइम (1999)
ने
पितृसत्तात्मक
नियंत्रण को विवाह
और परिवार संस्थाओं
के माध्यम से समझाया।
उनके अनुसार दहेज,
विवाह
बाजार और वंशदृचालित
परिवार प्रणाली
महिलाओं के सामाजिक
मूल्य को नियंत्रित
करती है। विवाह
के बाद महिला का
जीवन “पितृवंशीय
घर“ से “पति के घर“
की ओर शिफ्ट होता
है, जहाँ
उसकी पहचान संबंधों
और भूमिकाओं पर
आधारित होती है।
जेफरी
और जेफरी (2006)
ने
उत्तर भारत में
लड़कियों की शिक्षा
पर किए गए अध्ययन
में पाया कि शिक्षा
बढ़ने के बावजूद
रोजगार के अवसर
और सामाजिक स्वतंत्रता
समान रूप से नहीं
बढ़ती। परिवार का
मुख्य ध्यान लड़कियों
को “शादी योग्य”
बनाने पर होता
है, न कि
उन्हें आर्थिक
रूप से सक्षम बनाने
पर। इस शोध में
यह भी कहा गया कि
उच्च शिक्षा भी
अक्सर विवाह बाज़ार
में जोड़कर देखी
जाती है।
व्म्ब्क्
(2023) की रिपोर्ट
दर्शाती है कि
भारत में महिला
श्रम शक्ति भागीदारी
2022
में
लगभग 28 प्रतिशत
थी, जो एशिया
के सबसे कम अनुपातों
में से एक है। यह
आँकड़ा महिलाओं
के आर्थिक पिछड़ेपन
की स्पष्ट तस्वीर
प्रस्तुत करता
है।
विश्व
बैंक (2022) के
अनुसार भारत में
महिलाओं और पुरुषों
की शिक्षा में
अंतर कम हुआ है,
लेकिन
रोजगार पाने,
प्रमोशन
मिलने और औसत वेतन
के मामले में अंतर
अब भी काफ़ी अधिक
है। यह दिखाता
है कि “शिक्षा में
समानता“ अपने आप
“अवसरों में समानता“
नहीं बनाती।
UNDP
¼2023½ Gender Inequality Index बताता
है कि भारत आज भी
स्वास्थ्य,
प्रजनन
अधिकारों और राजनीति
में महिलाओं की
भागीदारी के मामले
में विश्व के मध्य-निचले
पायदान पर है।
महिला सशक्तिकरण
के लिए नीतियाँ
मौजूद होने के
बावजूद भारतीय
सामाजिक संरचना
उनकी प्रभावशीलता
को सीमित कर देती
है।
चंद्र
(2014) के अनुसार
जाति और वर्ग के
आधार पर महिलाओं
की स्थिति एक समान
नहीं है। दलित,
आदिवासी
और निम्न वर्ग
की महिलाएँ दोहरी
हाशियाकरण का सामना
करती हैं एक पितृसत्ता
के कारण और दूसरा
जाति/वर्ग आधारित
भेदभाव के कारण।
सेन
(2009) के Capability
Approach को कई अध्ययनों
में लागू किया
गया है, जिसके
अनुसार महिलाओं
की वास्तविक स्वतंत्रता
शिक्षा,
स्वास्थ्य,
गतिशीलता
और निर्णयदृनिर्धारण
की क्षमताओं से
निर्धारित होती
है। भारत में महिलाओं
की अधिकांश क्षमताएँ
सामाजिक मानदंडों
द्वारा सीमित कर
दी जाती हैं,
जिससे
वे अपने जीवन पर
पूर्ण नियंत्रण
नहीं रख पातीं।
सरन
(2019) के डिजिटल
लैंगिक अंतर पर
शोध में बताया
गया कि भारत में
इंटरनेट उपयोगकर्ताओं
में केवल 35
प्रतिशत
महिलाएँ हैं। डिजिटल
संसाधनों तक महिलाओं
की कम पहुँच उन्हें
आधुनिक अवसरों,
ऑनलाइन
शिक्षा और डिजिटल
अर्थव्यवस्था
से पीछे कर देती
है।
Kabeer
(1999) के अनुसार
सशक्तिकरण तीन
तत्वों पर आधारित
है (संसाधन),
(निर्णय क्षमता)
और (परिणाम)। भारतीय
महिला संसाधनों
पर नियंत्रण (जैसे
संपत्ति,
आय,
भूमि)
की कमी के कारण
विकसित नहीं कर
पातीं, जिससे
उपलब्धियों में
लगातार पिछड़ापन
बना रहता है।
NCERT
(2020) की स्कूल
शिक्षा पर रिपोर्ट
बताती है कि ग्रामीण
क्षेत्रों में
लड़कियों के का
मुख्य कारण घरेलू
ज़िम्मेदारियाँ,
परिवहन
की कमी और सुरक्षा
से जुड़ी चिंताएँ
हैं।
NCRB
(2022) के महिला
हिंसा संबंधी आंकड़ों
के अनुसार भारत
में प्रतिदिन औसतन
85
से
अधिक दहेज हत्या
और घरेलू हिंसा
के मामले दर्ज
होते हैं,
जो
दर्शाता है कि
हिंसा भी महिलाओं
की सामाजिक स्थिति
को सीमित करती
है।
अतः
प्रस्तुत सभी अध्ययनों
से यह स्पष्ट होता
है कि भारतीय महिलाओं
के पिछड़ेपन के
पीछे एकल कारण
नहीं, बल्कि
बहुस्तरीय सामाजिक
संरचना,
पितृसत्ता,
आर्थिक
निर्भरता,
लैंगिक
भूमिकाएँ,
शिक्षादृरोजगार
की असमानता,
और
सांस्कृतिक मानदंड
शामिल हैं। साहित्य
यह भी इंगित करता
है कि समस्या मात्र
“अवसरों की कमी“
की नहीं,
बल्कि
“अवसरों तक पहुँच“
और “उनका उपयोग“
करने की असमान
सामाजिक स्थितियों
की भी है।
सैद्धांतिक
परिप्रेक्ष्य
1. पितृसत्ता
सिद्धांत
इस
सिद्धांत के अनुसार
पितृसत्ता पुरुष
वर्चस्व का वह
तंत्र है जो परिवार,
संस्कृति,
कानून,
कार्यस्थल
और मीडिया जैसे
क्षेत्रों में
महिलाओं को द्वितीयक
स्थान पर रखता
है।
भारतीय
समाज में विवाह,
विरासत,
घरेलू
कार्य का बोझ,
और
निर्णय-निर्माण
में असमानता इसी
संरचना के उदाहरण
हैं।
2. संघर्ष
सिद्धांत
इस
सिद्धांत के अनुसार
समाज में असमान
संसाधन वितरण संघर्ष
पैदा करता है।
महिलाएँ
विशेषकर वंचित
जाति व वर्ग की
आर्थिक और सामाजिक
संसाधनों तक सीमित
पहुँच के कारण
दोहरे शोषण का
सामना करती हैं।
3. कार्यात्मक
सिद्धांत
यह
सिद्धांत बताता
है कि समाज अपने
आप को चलाए रखने
के लिए भूमिकाओं
का विभाजन करता
है।
भारत
में ‘पुरुष दृ कमाने
वाला’ और ‘महिला
दृ गृहिणी’ की भूमिका
को प्राकृतिक माना
जाता है,
जो
सशक्तिकरण में
बाधा है।
4. नारीवादी
सिद्धांत
नारीवादी
दृष्टिकोण मानता
है कि लैंगिक असमानता
सामाजिक रूप से
निर्मित है।
उदारवादी
नारीवादः
शिक्षा व कानून
पर बल
समाजवादी
नारीवादः
वर्ग व लैंगिक
उत्पीड़न का संयुक्त
विश्लेषण
दलित-स्त्रीवादः
जाति व पितृसत्ता
के दोहरे नियंत्रण
पर प्रकाश
अतः
प्रस्तुत समाजशास्त्रीय
सिद्धांत यह स्पष्ट
करते हैं कि महिला
सशक्तिकरण सामाजिक
संरचना में गहरे
परिवर्तन से ही
संभव है।
क्या
कहते हैं आँकड़े?
भारत
में महिलाओं की
सामाजिक,
आर्थिक
एवं राजनीतिक प्रगति
की स्थिति पर उपलब्ध
नवीनतम सांख्यिकीय
प्रमाण स्पष्ट
रूप से दर्शाते
हैं कि लैंगिक
समानता का लक्ष्य
अभी भी व्यापक
रूप से अधूरा है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी
कार्यालय के अनुसार,
यद्यपि
देश में महिला
साक्षरता दर निरंतर
वृद्धि का संकेत
देती है,
फिर
भी यह पुरुषों
की तुलना में उल्लेखनीय
रूप से कम लगभग
70
प्रतिशत
के आसदृपास स्थिर
बनी हुई है। यह
अंतर न केवल शैक्षिक
असमानता का द्योतक
है, बल्कि
सामाजिक अवसर-चेतना
की सीमाओं को भी
प्रतिबिंबित करता
है।
आर्थिक
क्षेत्र में स्थिति
और भी अधिक विषम
परिलक्षित होती
है। विश्व बैंक
(2022) का आकलन
बताता है कि भारत
में महिला श्रम
शक्ति सहभागिता
केवल 28 प्रतिशत
के आसपास है,
जो
वैश्विक औसत की
तुलना में अत्यंत
निम्न है। यह संकेतक
इस तथ्य की ओर इंगित
करता है कि शिक्षा
में सुधार के बावजूद
महिलाएँ आर्थिक
गतिविधियों में
सम्मिलित होने
से संरचनात्मक
एवं सामाजिक अवरोधों
के कारण वंचित
रह जाती हैं।
स्वास्थ्य
एवं पोषण की दृष्टि
से भी लैंगिक विषमता
स्पष्ट रूप से
दृष्टिगोचर होती
है। के अनुसार,
देश
में प्रजनन आयु
वर्ग की लगभग 57
प्रतिशत
महिलाएँ एनीमिया
से ग्रस्त पाई
गईं, जो
कि एक गंभीर सार्वजनिक
स्वास्थ्य समस्या
है और महिलाओं
के समग्र विकास
तथा श्रम उत्पादकता
पर प्रतिकूल प्रभाव
डालती है। यह आँकड़ा
भारतीय महिलाओं
की स्वास्थ्य-संबंधी
वंचनाओं का प्रत्यक्ष
सूचक है।
डिजिटल
पहुँच के क्षेत्र
में भी महिलाओं
का पिछड़ापन उल्लेखनीय
है। IAMAI (2023) की
रिपोर्ट के अनुसार,
भारत
में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं
में महिलाओं की
हिस्सेदारी मात्र
35
प्रतिशत
है। यह डिजिटल
लैंगिक अंतर (कपहपजंस
हमदकमत हंच) संकेत
करता है कि ज्ञान-सम्पदा,
ई-शिक्षा,
डिजिटल
अर्थव्यवस्था
और तकनीकी अवसरों
तक महिलाओं की
पहुँच अभी भी सीमित
है।
राजनीतिक
प्रतिनिधित्व
की दृष्टि से स्थिति
मिश्रित है। यद्यपि
स्थानीय शासन संस्थाओं
में 33प्रतिशत
आरक्षण के कारण
महिलाओं की उपस्थिति
औपचारिक रूप से
मजबूत हुई है,
किंतु
लोकसभा (2024)
में
महिलाओं की हिस्सेदारी
केवल 15 प्रतिशत
के निकट है। यह
भारतीय लोकतांत्रिक
प्रणाली में लैंगिक
समानता के अधूरेपन
को उजागर करता
है।
महिला
सुरक्षा के आँकड़ों
से भी उनका संवेदनशील
सामाजिक परिवेश
स्पष्ट होता है।
राष्ट्रीय अपराध
रिकॉर्ड ब्यूरो
के अनुसार,
प्रतिदिन
औसतन 85 से
अधिक महिलाओं से
संबंधित हिंसा
के मामले जिनमें
दहेज हत्या,
घरेलू
हिंसा और यौन अपराध
सम्मिलित हैं दर्ज
किए जाते हैं।
यह आँकड़ा न केवल
महिलाओं की सुरक्षा-स्थिति
का संकेत देता
है, बल्कि
उन संरचनात्मक
बाधाओं की ओर भी
इंगित करता है
जो उन्हें शैक्षिक,
आर्थिक
एवं सामाजिक प्रगति
से निरंतर दूर
रखती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय
मानकों के संदर्भ
में, में
भारत की रैंकिंग
मध्यम से निम्न
स्तर पर स्थित
है। यह इस बात का
प्रमाण है कि स्वास्थ्य,
प्रजनन
अधिकार,
शिक्षा,
आय
एवं राजनीतिक भागीदारी
जैसे बहु-आयामी
संकेतकों में महिलाएँ
अभी भी असमानताओं
का सामना कर रही
हैं।
अतः
उपरोक्त सभी सांख्यिकीय
प्रमाणों से यह
निष्कर्ष स्पष्ट
रूप से उभरता है
कि भारतीय महिलाओं
की प्रगति में
बाधाएँ केवल सतही
या व्यक्तिगत नहीं,
बल्कि
गहन सामाजिक-संरचनात्मक,
आर्थिक
और सांस्कृतिक
स्तर पर निहित
हैं। इस प्रकार
उपलब्ध आँकड़े न
केवल लैंगिक असमानता
की वास्तविकता
को प्रमाणित करते
हैं, बल्कि
उन व्यापक सुधारों
की आवश्यकता पर
भी बल देते हैं
जो महिलाओं के
समग्र सशक्तिकरण
हेतु अत्यावश्यक
हैं।
शोध पद्धति
प्रस्तुत
अध्ययन की पद्धति
गुणात्मक एवं वर्णनात्मक
है। महिला सशक्तिकरण
के समक्ष उपस्थित
सामाजिक निर्योग्यतांओं
की प्रकृति बहु-आयामी
एवं जटिल है,
इसलिए
यह अध्ययन संरचनात्मक,
सांस्कृतिक
और व्यवहारगत स्तरों
पर स्थित अवरोधों
को सम्यक रूप से
समझने हेतु बहु-स्रोत
(उनसजप-ेवनतबम)
डेटा एवं सैद्धांतिक
विश्लेषण को अपनाता
है।
सर्वप्रथम
द्वितीयक स्रोतों
से प्राप्त सामग्री
का व्यापक संकलन
किया गया। इन स्रोतों
में राष्ट्रीय
परिवार स्वास्थ्य
सर्वेक्षण ,
राष्ट्रीय
अपराध रिकॉर्ड
ब्यूरो,
राष्ट्रीय
सांख्यिकी कार्यालय,
संयुक्त
राष्ट्र मानव विकास
रिपोर्ट,
विश्व
आर्थिक मंच तथा
विश्व बैंक की
वार्षिक रिपोर्टें
सम्मिलित हैं।
इन प्रामाणिक डेटा
स्रोतों के विश्लेषण
के माध्यम से भारतीय
महिलाओं की शिक्षा,
स्वास्थ्य,
आर्थिक
सहभागिता,
राजनीतिक
प्रतिनिधित्व
तथा सुरक्षा-संबंधी
परिस्थितियों
का सूक्ष्म अवलोकन
संभव हुआ।
इसके
पश्चात् विभिन्न
समाजशास्त्रीय
एवं नारीवादी सिद्धांतों
पर आधारित सैद्धांतिक
विश्लेषण किया
गया, जिससे
यह समझ विकसित
की गई कि सामाजिक
संरचनाएँ किस प्रकार
महिलाओं के सशक्तिकरण
को प्रत्यक्ष एवं
परोक्ष रूप से
प्रभावित करती
हैं।
डेटा
विश्लेषण के लिए
थीमैटिक एनालिसिस
(जीमउंजपब ंदंसलेपे)
का उपयोग किया
गया, जिसके
अंतर्गत प्रमुख
विषयगत श्रेणियों
जैसे पितृसत्ता,
आर्थिक
निर्भरता,
शिक्षा-प्रवेश
बाधाएँ,
लैंगिक
हिंसा, डिजिटल
असमानता और सांस्कृतिक
रूढ़ियाँ की पहचान
की गई।
अध्ययन
का स्वरूप व्याख्यात्मक
है। इस पद्धति
के माध्यम से प्राप्त
निष्कर्षों को
मात्रात्मक आंकड़ों
एवं सैद्धांतिक
ढाँचे से जोड़कर
यह स्पष्ट किया
गया है कि महिला
सशक्तिकरण न केवल
व्यक्तिगत क्षमता
का प्रश्न है,
बल्कि
सामाजिक संरचनाओं
के परिवर्तन से
गहराई से संबद्ध
है।
महिला
सशक्तिकरण के समक्ष
सामाजिक निर्योग्यताओं
अध्ययन
से ज्ञात होता
है कि महिला सशक्तिकरण
के समक्ष कई प्रकार
की सामाजिक निर्योग्यताओं
विद्यमान हैंः
1. पितृसत्तात्मक
मान्यताएँ
महिलाओं
की गतिशीलता,
पहनावा,
निर्णय-सत्ता
और विवाह पर सामाजिक
नियंत्रण सशक्तिकरण
को सीमित करता
है।
2. आर्थिक
निर्भरता
महिला
श्रम-बल भागीदारी
सीमित होने से
महिलाएँ आर्थिक
रूप से पुरुषों
पर निर्भर रहती
हैं।
यह
निर्भरता अन्य
सभी प्रकार के
उत्पीड़न को मजबूत
करती है।
3. शिक्षा
की असमान पहुँच
ग्रामीण
और पिछड़े वर्गों
में लड़कियों की
शिक्षा अभी भी
पारिवारिक नियमों,
गरीबी
और सामाजिक मान्यताओं
द्वारा बाधित होती
है।
4. स्वास्थ्य
में असमानता
मातृ
मृत्यु दर,
एनीमिया
और पोषण कमी महिलाओं
के शारीरिक सशक्तिकरण
को कमजोर करती
है।
5. लैंगिक
आधारित हिंसा
यौन
हिंसा, दहेज
हत्या, घरेलू
हिंसा और साइबर
अपराध महिलाओं
की सुरक्षा और
आत्मविश्वास दोनों
को प्रभावित करते
हैं।
6. सामाजिक-आर्थिक
असमानताएँ
दलित,
आदिवासी
और गरीब महिलाओं
की स्थिति सबसे
अधिक दयनीय है।
यह
पदजमतेमबजपवदंसपजल
को दर्शाता है।
विचार.विमर्श
उपरोक्त
सभी तथ्यों से
ज्ञात होता है कि भारत में
महिला सशक्तिकरण
की प्रक्रिया एक
बहुस्तरीय,
बहु-आयामी
और गहन सामाजिक-संरचनात्मक
चुनौती है। यद्यपि
शिक्षा,
स्वास्थ्य,
विधान
और नीति-निर्माण
के स्तर पर उल्लेखनीय
सुधार हुए हैं,
किंतु
सामाजिक निर्योग्यताएँ
आज भी व्यापक रूप
से सक्रिय हैं
और महिलाओं के
वास्तविक सशक्तिकरण
को सीमित कर रही
हैं।
सबसे
प्रमुख तथ्य यह
उभरकर सामने आता
है कि भारतीय समाज
की संरचना मूलतः
पितृसत्तात्मक
है, और यह
पितृसत्ता आज भी
पारिवारिक,
आर्थिक,
सांस्कृतिक
और राजनीतिक संस्थाओं
के माध्यम से स्वयं
को निरंतर पुनरुत्पादित
करती है। महिलाओं
की शिक्षा में
वृद्धि के बावजूद
श्रम शक्ति में
उनकी सहभागिता
अत्यंत निम्न
(लगभग 28प्रतिशत)
है। यह स्पष्ट
करता है कि केवल
संसाधनों की उपलब्धता
पर्याप्त नहीं;
सामाजिक
मान्यताओं,
पारिवारिक
भूमिकाओं और आर्थिक
संरचनाओं में गहरे
परिवर्तन आवश्यक
हैं।
ऐसा
प्रतीत होता है
कि महिलाओं का
पिछड़ापन मुख्यतः
अवसर-असमानता
(वचचवतजनदपजल पदमुनंसपजल)
और निर्णय-असमानता
(कमबपेपवद पदमुनंसपजल)
के संयुक्त प्रभाव
का परिणाम है।
उदाहरणस्वरूप,
छथ्भ्ै-5
के
अनुसार अधिकांश
महिलाएँ स्वयं
के स्वास्थ्य,
आर्थिक
निर्णयों अथवा
पारिवारिक संपत्ति
से संबंधित निर्णयों
में स्वतंत्र नहीं
हैं। इससे यह निष्कर्ष
निकलता है कि सशक्तिकरण
का अर्थ केवल शिक्षा
या रोजगार तक सीमित
नहीं, बल्कि
एजेंसी और स्वायत्तता
पर आधारित होना
चाहिए।
इसके
अतिरिक्त,
यह
अध्ययन दर्शाता
है कि महिलाओं
की स्वास्थ्य स्थिति
स्वयं में एक महत्वपूर्ण
सामाजिक निर्योग्यता
है। 57 प्रतिशत
महिलाओं में एनीमिया
का होना यह संकेत
देता है कि स्वास्थ्य
संबंधी असमानताएँ
केवल चिकित्सा
पहुँच का प्रश्न
नहीं, बल्कि
पोषण, घरेलू
श्रम का भार,
सामाजिक
उपेक्षा और सांस्कृतिक
मान्यताओं से भी
गहराई से संबंधित
हैं। यह मुद्दा
महिला श्रम शक्ति
सहभागिता,
मातृत्व
स्वास्थ्य,
बाल
पोषण और अंतर-पीढ़ीगत
असमानताओं पर गंभीर
प्रभाव डालता है।
डिजिटल
अंतर ने भी महिला
सशक्तिकरण को नई
प्रकार की असमानताओं
से प्रभावित किया
है। इंटरनेट उपयोग
में महिलाओं की
कम हिस्सेदारी
(35प्रतिशत)
यह दर्शाती है
कि डिजिटल युग
में भी महिलाएँ
सूचना, कौशल,
ई-गवर्नेंस,
ऑनलाइन
शिक्षा और डिजिटल
अर्थव्यवस्था
के अवसरों से पूर्णतः
लाभान्वित नहीं
हो पा रही हैं।
यह अंतर डिजिटल
सक्षम समाज के
निर्माण में महत्वपूर्ण
चुनौती प्रस्तुत
करता है।
राजनीतिक
क्षेत्र में भी
महिलाओं का अधूरा
प्रतिनिधित्व
यह बताता है कि
भारत की लोकतांत्रिक
संरचना अभी भी
पूर्णतः समावेशी
नहीं है। स्थानीय
शासन में 33प्रतिशत
आरक्षण होने के
बावजूद,
राष्ट्रीय
राजनीति में महिलाओं
की भागीदारी मात्र
15प्रतिशत
होना इस बात का
संकेतक है कि संरचनात्मक
और सांस्कृतिक
दोनों प्रकार की
सीमाएँ राजनीतिक
सशक्तिकरण को बाधित
करती हैं।
नारीवादी
सिद्धांत और क्षमता
दृष्टिकोण के संदर्भ
में देखा जाए तो
स्पष्ट रूप से
यह समझ में आता
है कि आर्थिक अवसरों
का विस्तार तभी
सार्थक होगा जब
महिलाएँ सामाजिक
प्रतिबंधों से
मुक्त होकर अपने
जीवन के लक्ष्यों
को चुनने की वास्तविक
स्वतंत्रता प्राप्त
करें। इस संदर्भ
में उपलब्ध आंकड़े
यह भी संकेत देता
है कि महिलाओं
की एजेंसी मुख्यतः
पारिवारिक संरचना,
सांस्कृतिक
मानदंडों और पुरुष-प्रधान
निर्णय प्रणालियों
द्वारा सीमित होती
है।
अंततः
यह अध्ययन यह इंगित
करता है कि किसी
भी समाज में महिला
सशक्तिकरण तभी
सार्थक रूप से
प्रगति कर सकता
है जबकृ
1.
संरचनात्मक
पितृसत्ता को चुनौती
दी जाए,
2.
महिलाओं
को आर्थिक,
सामाजिक
और राजनीतिक निर्णयों
में केंद्र में
लाया जाए,
3.
लैंगिक
समानता को परिवार,
समुदाय
और संस्थागत स्तर
पर मूल्य-रूप में
अपनाया जाए,
4.
और
महिलाएँ स्वयं
अपनी क्षमताओं,
अधिकारों
एवं आकांक्षाओं
के प्रति अधिक
जागरूक और स्वतंत्र
हों।
अतः
कहा जा सकता है कि भारत
में महिला सशक्तिकरण
की प्रक्रिया अभी
संक्रमणकाल में
है जहाँ
महिलाएँ प्रगति
कर रही हैं,
पर
सामाजिक निर्योग्यताएं
निरंतर रूपांतरण
की माँग कर रही
हैं। इसलिए सशक्तिकरण
की दिशा में बहुआयामी,
समावेशी
और दीर्घकालिक
सामाजिक परिवर्तन
अनिवार्य है।
निष्कर्ष
प्रस्तुत
अध्ययन का मुख्य
निष्कर्ष यह है
कि भारत में महिला
सशक्तिकरण के समक्ष
सामाजिक निर्योग्यताएं
केवल बाहरी प्रतिरोध
नहीं हैं;
वे
गहराई से सांस्कृतिक
प्रतीकवाद में निहित
हैं जैसे “अच्छी
लड़की” की परिभाषा,
मर्यादा
और सम्मान के मानदंड,
विवाह-केंद्रित
जीवन, और
घरदृपरिवार की
प्राथमिकता। ये
प्रतीकात्मक अवरोध
महिलाओं की आकांक्षाओं
और आत्म-विश्वास
को सीमित करते
हैं, और
अक्सर महिलाएँ
स्वयं इन मान्यताओं
को आंतरिक कर लेती
हैं, जो
ठवनतकपमनेपंद
प्रतीकात्मक हिंसा
सिद्धांत की पुष्टि
करता है।
भारत
में महिला सशक्तिकरण
की प्रक्रिया जटिल
है और सामाजिक-सांस्कृतिक
संरचनाओं से गहराई
से प्रभावित होती
है। यद्यपि कानून
और योजनाएँ मौजूद
हैं, लेकिन
पितृसत्ता,
परंपरागत
मान्यताएँ और संसाधनों
की असमान उपलब्धता
वास्तविक सशक्तिकरण
में बाधक हैं।
महिला
सशक्तिकरण के लिए
आवश्यक है कि
शिक्षा
व स्वास्थ्य की
समान पहुँच सुनिश्चित
हो,
आर्थिक
अवसर बढ़ें,
लैंगिक
पूर्वाग्रह कम
हों,
कानूनी
जागरूकता बढ़े,
और
पुरुषों की सकारात्मक
भागीदारी सुनिश्चित
की जाए।
संरचनात्मक
परिवर्तन,
सामाजिक
जागरूकता और समानतावादी
दृष्टिकोण ही महिलाओं
को वास्तविक सशक्तिकरण
की ओर ले जा सकते
हैं।
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