प्रस्तावना

अतीत से वर्तमान तक संसार के सभी महान दार्शनिकों, विचारोंकों एवं शिक्षाविदों में महिला शिक्षा के महत्व को सर्वसम्मति से सदैव ही स्वीकार किया है। प्राचीन भारतीय परंपरा,सभ्यता एवं संस्कृति में महिलाओं का स्थान अग्रणी रहा है। महिला को सदैव देवी तुल्य माँ अथवा सहचरी कहकर ही संबोधित किया गया है। ऐसा कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यंते तत्र देवता रमन्ते अर्थात जहां नारी की पूजा की जाती है वहां देवताओं का वास होता है। देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय संविधान में भी लिंग भेद की असमानता को समाप्त कर सभी को समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है। किंतु फिर भी रूढ़िवादी विचारधारा के कुछ आकाओं के कारण बहुत बड़े स्तर पर सदियों तक नारी को शिक्षा से वंचित रखा गया है।

स्वामी विवेकानंनद जी ने तो यहां तक कहा कि नारी को सदैव असहाय एवं दूसरों की दासता व निर्भरता का ही प्रतीक माना गया है। प्राचीन काल एवं मध्यकालीन समय में स्त्रीयों को अंधकार में रखकर उनको दासता के कार्यक्रमों का ही कर्तव्य ज्ञान कराया गया। उदाहरणतः कहा गया है कि एकै धर्म एक व्रत नेमा, काय वचन पति पद प्रेमा अर्थात स्त्री का एक ही धर्म है कि उसे अपने पति के चरणों में प्रेम रखना चाहिए किंतु निःसंदेह आज परिस्थितियां बदल गई हैं वर्तमान में महिलाएं शिक्षा प्राप्त करके समाज के महत्वपूर्ण कार्यां में योगदान दे रही है। वर्तमान में घर की चार दिवारी के अंदर घुटकर भाग्य के भरोसे बैठे रहने एवं अज्ञानता के आवरण से निकलकर वह पुरूषों के साथ समान प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हो रही हैं एवं समान भागीदारी दे रही हैं। यह कहना गलत न होगा कि यह महिला सशक्तीकरण के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ

प्राचीन काल में महिला शिक्षा

भारतवर्ष में प्राचीनकाल से ही स्त्रीयों को पुरूषों के समान महत्व दिया जाता था। वैदिक काल में स्त्री और पुरूष में किसी प्रकार का अंतर नहीं था इसके प्रमाण वैदिक साहित्य में भरे पड़े हैं। वैदिक साहित्य में गार्गी, मैत्रीय, शंकुन्तला इत्यादि अनेक विदुषी महिलाओं के चर्चा मिलती है। हालांकि इस समय यह शिक्षा लगभग सीमित थी तथा उच्च वर्ग के परिवारों की महिलाएं ही इन अवसरों का प्रयोग कर पाती थीं। उस समय प्राचीन काल में मैत्रयी, तोपमुद्रा, अपाला शैब्या, सीता, उर्मिला विद्योत्तमा, चुडाला जैसी अनेक नारियों ने अपनी समर्पण भावना, विद्वता एवं त्याग का उदाहरण प्रस्तुत किया था।

बौद्धकाल में प्रारंभिक वर्षों में स्त्रियों को प्रवेश नहीं दिया जाता था, परंतु बाद में महात्मा बुद्ध ने स्त्रियों को संघ के रूप में प्रवेश करने की अनुमति देकर स्त्री शिक्षा को एक नया आयाम दिया, जिसके कारण स्त्री शिक्षा को एक नया जीवन मिला उस समय के संघमित्रा जैसी विदुषीयों के नाम उल्लेखनीय है शिक्षा केवल धनी-मनी व कुलीन घरानों तक ही सीमित थी।

मुस्लिम काल में नारी शिक्षा

मुस्लिम काल में भी स्त्रियों शिक्षा से उपेक्षित ही रहीं। उस काल में बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी प्रथा प्रचलित होने के कारण छोटी-छोटी बालिकाओं के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों शिक्षा से वंचित रह जाती थी। शाही घरानों तथा समाज के धनी वर्गो की बालिकायें अपने घरों से शिक्षा प्राप्त करती थी मुस्लिम बालिकायें मस्जिद से जुड़े मकतबों में तथा सम्रात, कुलीन तथा शाही परिवार प्राय अपना घरों में मौलवी को बुलाकर स्त्रियों की शिक्षा की व्यवस्था की जाती थी मुस्लिम काल में सामान्य वर्ग की स्त्रियों में रजिया सुल्ताना, चाँद बीबी, नूरजहाँ, गुलबदन बेगम, जेबुनिशा रानी दुर्गावती, जीजाबाई, अहिल्याबाई के नाम विशेष उल्लेखनीय है।

अंग्रेजी काल में नारी शिक्षा

अंग्रेजी काल में अंग्रेजी कंपनी को देश में अपना शासन चलाने के लिए नारी लिपिकों व प्रशासकों की कोई आवश्यकता नहीं थी और न ही इस दिशा में अंग्रेजी कंपनी ने प्रयास किया। समाज एवं धर्म में अनेक अंधविश्वास प्रचलित होने के कारण अंग्रेजी कंपनी ने नारी शिक्षा में कोई रूचि नहीं ली थी। अंग्रेजी कंपनी शासन के दौरान नारी शिक्षा का प्रचार- प्रसार मिशनरियों तथा सामाजिक संस्थानों के द्वारा किये गये प्रयासों से प्रारंभ हुये थे। 1854 में आदेश पत्र में अधिकारिक तौर पर सबसे पहले नारी शिक्षा के महत्व को स्वीकार किया गया तथा शिक्षा के प्रसार के सभी संभव प्रयास किये जाने की बाते कही गईं थी। परिणामस्वरूप नारी को प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की गयी। 1902 ई० तक नारी शिक्षा ने एक आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया था। आर्य समाज, ब्रह्म समाज जैसी संस्थाओं ने स्त्री शिक्षा पर विशेष बल दिया। अंग्रेजी शासन के दौरान कस्तूरबा गाँधी, भीखा जी कामा जैसी अनेक महिलाऐं ने अपने देश प्रेम, त्याग व योग्यता से महिलाओं की उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया।

सन् 1917 से 1947 तक स्त्री शिक्षा का विकास तीव्र गति से हुआ। इस काल में स्त्रियों ने आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया था। इस समय भारतीय नारी संगठन तथा राष्ट्रीय महिला परिषद की स्थापना हुई थी। 1927 में अखिल भारतीय नारी सम्मेलन की स्थापना हुई। शारदा एक्ट के द्वारा बाल विवाह पर प्रतिबंध लगा दी गया था। परिणामस्वरूप नारी शिक्षा संस्थाओं की संख्या बढ़ी एवं साथ ही बड़ी संख्या में नारियों शिक्षा ग्रहण करने लगीं।

नारी शिक्षा की वर्तमान स्थिति सन् 1947 में स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद नारी कि सामाजिक तथा शैक्षिक स्थिति में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। आज नारी शिक्षा अज्ञानता, परतंत्रता, रूढिवादिता तथा असहायता के बंधनों से मुक्त होकर भारतीय स्त्रियाँ एक सम्मानजनक जीवन जी रही हैं। स्त्रियों से संबंधित सामाजिक मान्यताएं बदल रही हैं। भारतीय संविधान में पुरुषों तथा स्त्रियों को पूर्ण समान दर्जा देते हुए भी शिक्षा के प्रसार पर बल दिया जा रहा है।

भारत में स्वतंत्रता के बाद नारी शिक्षा के मार्ग में आने वाली बाधाओं को जानने तथा उसका समाधान प्रस्तुत करने हेतु अनेक प्रकार की समितियों एवं आयोगों का गठन किया गया। भारत में नारी शिक्षा की आवश्यकता विशिष्ट महत्व है क्योंकि कोई भी काम चाहे सामाजिक हो या आर्थिक या सांस्कृतिक या राजनैतिक हो, बिना महिला के पूर्ण नहीं हो सकता है। एक अच्छे समाज के निर्माण का आधार भी महिला है, महिला समाज में निरंतरता तथा उत्पादकता का भी प्रमुख आधार है। वास्तव में संपूर्ण समाज के निर्माण एवं विकास की सभावनाएँ महिला पर ही निर्भर करती हैं। इसलिए महिला शिक्षा की अवहेलना करना समाज के प्रति न्याय न करना होगा। नारी शिक्षा के महत्व के संबंध में कुछ प्रमुख विचारकों विद्वानों तथा शिक्षाविदों ने निम्न प्रकार के विचार व्यक्त किये हैं-

1.       नेपोलियन - मुझे सुशिक्षित माताएँ दो, मैं एक सुशिक्षित राष्ट्र का निर्माण कर दूँगा।

2.       जगजीवन राम-एक कन्या को पढ़ा देने से आगे आने वाली पीड़ी सुशिक्षित होगी।

3.       पंडित नेहरू- लड़के की शिक्षा केवल एक व्यक्ति की शिक्षा है परंतु एक लड़की की शिक्षा संपूर्ण परिवार की शिक्षा है।

4.       राष्ट्रपति लिंकन- मैं जो कुछ भी हूँ और जो कुछ होने की आशा करता हूँ, उसके लिए में अपनी माता का कृतज्ञ हूँ।

5.       फोरेबल- माताएँ आदर्श अध्यापिकाएँ हैं।

उपरोक्त कथनों से स्पष्ट कहा जा सकता है कि स्त्रियां परिवार का आधार हैं, वे अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र के गौरव को उँचा उठाती हैं, बच्चे वैसा ही बनते हैं, जैसा माँ उन्हें बनाती है। बच्चों के विकास में सर्वाधिक योग माँ का होता है। अतः वर्तमान समय में महिला शिक्षा की आवश्कता और महत्व को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। स्त्री शिक्षा की आवश्यकता निम्नलिखित दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।-

1.       स्त्री का नारीत्व शिक्षा से निखर जाता है।

2.       शिक्षित स्त्री ही अपने गौरवांवित अस्तित्व को समझ सकती है।

3.       स्त्री शिक्षा परिवार के लिए विशेष उपयोगी होता है।

4.       शिक्षित स्त्री परिवार का उत्थान करने में सफल हो सकती है।

5.       शिक्षित स्त्री ही अपने संतानों की सुशिक्षा एवं सुसंस्कार ला सकती है।

6.       शिक्षित स्त्री अपने आनेवाली पीढ़ी के भविष्य को उज्जवल बनाने में सफल होती है।

7.       शिक्षित स्त्री में सहिष्णुता, साहस, निष्ठा, शिष्टाचार, सहनशीलता जैसे गुणों को व्यक्तित्व में शामिल करने हेतु स्त्री शिक्षा की आवश्यकता है।

8.       स्त्री शिक्षा नारियों को पारिवारिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय दायित्वों एवं कर्तव्यों का बोध कराती है।

9.       शिक्षित स्त्री ही स्त्री में शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों के विकास के लिए प्रेरणा दे सकती है।

10.     शिक्षित स्त्री ही व्यक्तित्व विकास के लिए समुचित अवसरों को प्राप्त कर सकती है ।

11.     शिक्षित स्त्री जगत और जीवन के संबंधों को अवबोधित करने में सहायता प्रदान करती है। इस प्रकार, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक तथा लोकतंत्र दृष्टि से स्त्री शिक्षा का विशेष महत्व है।

नारी शिक्षा की समस्याएँ अनेकानेक हैं एवं निःसंदेह स्वतंत्र भारत में नारी शिक्षा की स्थिति में क्रातिकारी परिवर्तन हुए हैं। इसके बावजूद भी नारी शिक्षा की वर्तमान स्थिति को संतोषप्रद स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वर्तमान में नारी शिक्षा के मार्ग मे निम्नलिखित समस्याएँ हैं-

1.       शैक्षिक अवसर समानता की समस्याः लड़कियों की शिक्षा के मार्ग में उनकी सबसे बड़ी बाधा यह है कि लड़कियों को लड़कों के समान शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध नहीं हो पाता है। हमारे यहाँ शिक्षा के सभी स्तरों और लगभग सभी पक्षों में असमानताएँ पायी जाती है।

2.       नारी शिक्षा के प्रति दृष्टिकोण: आज के विज्ञान और प्रोद्यौगिकी के इस युग में यद्यपि रुढ़िवादी विचारां, अधविश्वासो तथा दोषपूर्ण रीति रिवाजों की उपयोगिता को नकार नहीं जा सकता है फिर भी अनेक लोग इन रूढिवादियों अंधविश्वासों तथा परंपराओं का पोषण एवं समर्थन करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश की जनसंख्या के एक बड़े वर्ग में लड़कियों की शिक्षा के प्रति अभी भी सीमित संकुचित एवं रुढिवादी विचार पाये जाते हैं, छुआछूत, बाल विवाह, पर्दा प्रथा जैसी रूढ़ियों के कारण अनेक बालिकाओं को शिक्षा से वंचित रह जाना पड़ता है। रूढ़िवादी व्यक्ति के विचार में लड़कियां शिक्षा प्राप्त करके समानता व स्वतंत्रता की मांग करती हैं, जो स्त्री चरित्रहीनता का सूचक होती है।

3.       अपव्यय व अवरोधन की समस्या: अपव्यय तथा अवरोधन स्त्री शिक्षा की एक गंभीर समस्या है। अन्य समस्यओं की तुलना में स्त्री शिक्षा में अपव्यय तथा अवरोधन अधिक पाया जाता है। देखा गया है कि कक्षा में प्रवेश लेने वाली प्रत्येक 100 लड़कियों में से केवल 35 लड़कियाँ ही कक्षा पाँच में पहुंच पाती है तथा लगभग 20 कक्षा आठ में पहुंच पाती है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में एंव शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक पायी जाती है। निर्धनता, अशिक्षित माता-पिता, रुढिवादिता, लड़कियों के प्रति समुचित एवं नकारात्मक दृष्टिकोण, नीरस पाठयक्रम, अनाकर्षक विद्यालयी वातावरण, परामर्श व निर्देशन का का अभाव इत्यादि लड़कियों में अव्यय एवं अवरोधन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है।

4.       दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली: दोषपूर्ण पाठयक्रम एवं दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली स्त्री शिक्षा की एक बड़ी समस्या है। हमारे यहाँ लड़के एवं लड़कियों का एक समान पाठयक्रम है। प्रचलित पाठ्यक्रम नीरसता तथा अरूचिकर है। ज्ञान प्रधान, पुस्तक प्रधान तथा अव्यवहारिक होने के कारण वर्तमान पाठ्यक्रम परिस्थितियों को अपनी बदलती परिस्थितियों से समायोजन करने के लिए तैयार करने में असफल रहा है।

5.       दोषपूर्ण प्रशासन: स्त्री शिक्षा का समुचित विकास न होने का एक प्रमुख कारण दोषपूर्ण प्रशासन है, स्त्रियों की शिक्षा के विकास में अनेक प्रशासनिक कठिनाइयों तथा बाधायें अनुभव की जाती है। सभी राज्यों में स्त्री शिक्षा का प्रशासनिक भार पुरुष अधिकारियों पर है, पुरुष होने के कारण वह न तो स्त्रियों को विशिष्ट आवश्यकताओं को समझ पाते है और न ही स्त्री शिक्षा में विशेष रूचि लेते हैं। स्त्री शिक्षा के प्रशासन व पर्यवेक्षण का उत्तरदायित्व स्त्रियों को सौपा जाना चाहिए।

6.       शिक्षकों का अभाव: महिला शिक्षा के प्रसार में एक बहुत बड़ी बाधा अध्यापिकाओं की कमी भी है। महिला शिक्षा में न केवल उच्च स्तर पर वरन् प्राथमिक स्तर पर भी प्रशिक्षित अध्यापिकाओं की कमी है, जिसके कारण अनेक माता-पिता अपने लड़कियों को विद्यालय नहीं भेजना चाहती हैं। महिला शिक्षा की कमी, शिक्षित महिलाओं को पारिवारिक कारणों से नौकरी न करना, सुरक्षा, आस-पास आदि वजह से अन्य शहरों या गाँवों में नौकरी न कर पाना आदि कुछ ऐसे कारण हैं, जिसकी वजह से अध्यापिकाओं का अभाव रहता है। इनकी उन्नति के लिए प्रयास किया जाना चाहिये।

7.       आर्थिक समस्या: स्त्री शिक्षा के विकास में बाधा का एक कारण समुचित धन का अभाव है। वर्तमान समय में शिक्षा को एक निवेश माना जाता है, जिसके लिए समुचित मात्रा में धन की आवश्यकता होती है। सरकार की जितनी रूचि लड़कों की शिक्षा में है, उतनी रूचि लड़कियों की शिक्षा में नहीं है। स्त्री शिक्षा के लिए अलग से धनराशि निर्धारित करनी होगी जिससे केवल लड़कियों की शिक्षा पर ही धन व्यय किया जा सके।

8.       व्यवसायिक व तकनीकी शिक्षा की समस्या: स्त्रियों के लिए व्यवसायिक तथा तकनीकी शिक्षा की कमी एक गंभीर समस्या है। स्त्रियों के उत्थान के लिए विकास करने का भार अपने उपर होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में नारी शिक्षा के प्रसार के लिए विशेष प्रयास किये जाने चाहिए। नारी शिक्षा की समस्याओं पर विचार करने के लिए राष्ट्रीय महिला शिक्षा परिषद नामक पृथक इकाई का गठन करना चाहिए जबकि नारी शिक्षा के प्रसार हेतु राज्यों में लड़कियों की शिक्षा की राज्य परिषद् गठित करनी चाहिए। यह आवश्यक है कि उन्हें विभिन्न प्रकार के व्यवसायिक तथा तकनीकी शिक्षा उपलब्ध करायी जाय एवं लड़कियों की शिक्षा के लिए उनकी रुचि के अनुरूप विभिन्न प्रकार के व्यवसायिक तथा तकनीकी पाठ सिखाया जाना चाहिए। स्वतंत्रता के बाद नारी शिक्षा के मार्ग मे आनेवाली समस्याओं को जानने तथा उसका समाधान प्रस्तुत करने हेतु अनेक समितियों तथा आयोगों का गठन किया गया। इनमें कुछ प्रमुख आयोग तथा समितियों के सुझाव निम्नलिखित है-

1.       विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग: विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने स्त्री शिक्षा के लिए लिखा है कि शिक्षित स्त्रियों के बिना शिक्षित स्त्री की प्र्रक्रिया पूरी नहीं हो सकती है। स्त्रियों की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि जिससे वे सुगमाता से गृहिणी बन सके। विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग ने कहा कि शिक्षा संस्थानों का पाठयक्रम ऐसा होना चाहिए कि जिससे स्त्रियों को समाज में अपना सम्मानजनक स्थान प्राप्त हो सके।

2.       माध्यमिक शिक्षा आयोग: माध्यमिक शिक्षा आयोग ने बालिकाओं के पाठ्यक्रम में विभिन्नता लाने पर विशेष जोर नहीं दिया किंतु माध्यमिक शिक्षा आयोग ने बालिकाओं को कला एवं गृह विज्ञान के अध्ययन की सुविधा प्रदान करने का विशेष बल दिया था। माध्यमिक शिक्षा आयोग ने अध्यापिकाओं को सेवा सुविधा प्र्रदान करने का भी सुझाव दिया था।

3.       दुर्गाबाई देशमुख समिति: स्त्री शिक्षा की समस्या तथा समाधान करने पर विचार करने के लिए सन् 1958 में भारत सरकार ने दुर्गाबाई देशमुख की अध्यक्षता में राष्ट्रीय महिला शिक्षित समिति का गठन किया था। जिसे समिति का अध्ययन के नाम पर इसे दुर्गाबाई देशमुख समिति कहकर भी पुकारा जाता है। दुर्गाबाई देशमुख समिति का प्रमुख कार्य स्त्री से संबंधित समस्याओं का अध्ययन करके उनके हल हेतु सुझाव देना है। दुर्गाबाई देशमुख समिति ने यह सुझाव दिया कि भारत सरकार को एक निश्चित अवधि के अंतर्गत निश्चित योजना के अनुरूप स्त्री शिक्षा का विकास करने का भार अपने उपर लेना चाहिए। दुर्गाबाई देशमुख समिति ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए विशेष प्रयास किये जाने चाहिए।

4.       हंसा मेहता समिति: सन् 1962 में राष्ट्रीय महिला विद्या परिषद् ने विद्यलय स्तर पर बालक तथा बालिकाओं के पाठ्यक्रम में अंतर होने अथवा नहीं होने की महत्वपूर्ण समस्या पर विचार करने हेतु श्रीमती हंसा मेहता की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसे अध्यक्षा के नाम पर ही श्रीमती हंसा मेहता समिति कहा जाता है। ह श्रीमती हंसा मेहता समिति ने कहा कि विद्यालय स्तर पर बालक तथा बालिकाओं के पाठयक्रम में अंतर नहीं होना चाहिए। शिक्षा का संबंध व्यक्तिगत क्षमताओं तथा रूचियों से होना चाहिए न कि यौन भेद। श्रीमती हंसा मेहता समिति के अनुसार यौन के आधार पर अंतर करने की आवश्यकता नहीं है।

5.       भक्त वत्सल कमेटी रिपोर्ट: भक्त वत्सलम् कमेटी ने कहा कि बालिकाओं के विद्यालयों में यथासंभव अध्यापिकाएँ नियुक्त की जानी चाहिए। भक्त वत्सलम् कमेटी ने कहा कि अध्यापिकाओं की कार्य परिस्थिति आकर्षक बनाई जानी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में अकालीन अध्यापिकाओं को लगाया जाना चाहिए। महिला निरीक्षक का प्रबंध होना चाहिए तथा एक विषय की व्यवस्था लड़कियों की रूचि एवं कार्य क्षेत्र के अनुरूप होना चाहिए।

6.       डॉ दौलत सिंह कोठारी कमीशन: सन् 1964 में डॉ दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन किया गया था। डॉ दौलत सिंह कोठारी ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि महिला शिक्षा की समस्या पर विचार किया जाना चाहिये तथा डॉ दौलत सिंह कोठारी ने मानव संसाधनों का विकास परिवारों की उन्नति तथा बालकों की चरित्र निर्माण में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की शिक्षा को अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिये। उच्च प्राथमिक स्तर पर लड़कियों के लिए अलग अलग स्कूल खोलने, निःशुल्क छात्रावास एवं छात्रवृतियों की व्यवस्था करने, लड़कियों के लिए पार्ट टाइम एजुकेशन, अल्पकालीन शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था करने कॉलेज खालने, नारी शिक्षा अनुसंधान इकाई खोलने तथा केंद्र एवं राज्य स्तर पर शिक्षा के संचालन से संबंधित प्रासंगिक तंत्र का गठन जैसे महत्वपूर्ण कार्य करने के सुझाव प्रस्तुत किये थे।

7.       राष्ट्रीय शिक्षा नीति: सन् 1980 में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महिलाओं की शिक्षा में व्यापक परिवर्तन लाने की संकल्पना की गई थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के तहत् कार्यान्वयन कार्यक्रम में महिला शिक्षा से संबंधित निम्नलिखित कई प्रावधानों को सम्मिलित की गया है-

(1)      देश के शिक्षा संस्थाओं को महिला विकास के कार्यक्रम को संचालित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।

(2)      देश के शिक्षा संस्थाओं में विभिन्न स्तरों के व्यवसायिक तकनीकी तथा वृतिक शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाना चाहिये।

(3)      देश के शिक्षा संस्थाओं में यौन विमेद की नीति को समाप्त किया जाना चाहिये ।

(4)      देश के शिक्षा संस्थाओं में महिला शिक्षा के मार्ग में आने वाली समस्याओं के निराकरण से संबंधित प्रयासों को प्राथमिकता दी जाना चाहिये ।

(5)      देश के शिक्षा संस्थाओं में पाठ्य पुस्तकों, नीति निर्धारकों, प्रशासकों तथा शिक्षा संस्थाओं की सहभागिता के द्वारा नये मूल्यों को स्थापित किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

इस प्रकार स्पष्ट है कि देश के शिक्षा संस्थाओं में स्वतंत्रता के उपरांत नारी शिक्षा के प्रतिकूल प्रचलित संकुचित दृष्टिकोण को समाप्त करने का प्रयास किया गया है एवं भारत में पुरुषों के समान स्त्रियों को शैक्षिक अधिकार प्रदान किये गये हैं। महिलाएं सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षिक क्षेत्रों में पुरुष के समान सक्रिय रूप से भाग ले रही है औैर केंद्र व राज्य सरकार के द्वारा बालिकाओं के शिक्षा के संदर्भ में अनेक प्रकार की योजनाओं को लागू करने का प्रयास करना चाहिये।