भारत
की आर्थिक
समस्याओं का
गांधीवादी
समाधान
डॉ. अशोक
कुमार महला*
सहायक
आचार्य, राजनीति
विज्ञान, राजकीय
कला
महाविद्यालय, सीकर, राजस्थान
drashokmahala@gmail.com
सारांश
भारत
विश्व की
उभरती हुई
अर्थव्यवस्थाओं
में से एक है।
भारत एक
विकासशील देश
है जो तीव्र आर्थिक
प्रगति के साथ
आगे बढ़ रहा
है। परन्तु इसके
सामने अनेक
आर्थिक
समस्याएँ
विद्यमान हैं।
भारत के
विभिन्न
आर्थिक
समस्याओं के
व्यापक प्रयास
व्यक्तिगत
स्तर और
शासकीय स्तर
पर लगातार किए
जा रहे हैं, परंतु
इसके साथ-साथ
गांधीवादी
विकल्प एक
श्रेष्ठ
प्रयास सिद्ध
हो
सकता है। इन
समस्याओं के
समाधान के लिए
गांधी के
विचार आज भी
अत्यंत
प्रासंगिक और
उपयोगी माने
जाते हैं।
गांधीवादी
अर्थशास्त्र
नैतिकता, आत्मनिर्भरता
और समानता पर
आधारित है।
गांधीवादी
अर्थशास्त्र
का केंद्र “मानव कल्याण” है, न
कि मात्र
उत्पादन और
लाभ।
गांधीवादी
विचारधारा एक
वैकल्पिक और
टिकाऊ मार्ग
प्रस्तुत
करती है
क्योंकि
गांधी का
आर्थिक चिंतन केवल
धन-संपत्ति
के उत्पादन तक
सीमित नहीं था, बल्कि
यह नैतिकता, सामाजिक
न्याय और
मानवीय
मूल्यों पर
आधारित था।
मुख्य
शब्द : गांधीवादी
अर्थशास्त्र, आत्मनिर्भरता, अमृतकाल, स्वर्णिम
युग, विकासशील
राष्ट्र, विकसित
राष्ट्र, सत्य, अहिंसा, आत्मनिर्भरता, अर्थ-दर्शन,
मिश्रित
अर्थ-दर्शन, अपरिग्रह, ट्रस्टीशिप, कल्याणकारी
राज्य, श्रम-पंूजी, सर्वोदय, जनतांत्रिक
सामाजिक, आर्थिक एवं
राजनीतिक
व्यवस्था, स्वदेशी, सामाजिक
न्याय, पर्यावरणीय
संकट और
उपभोक्तावाद
प्रस्तावना
भारत आज
विश्व की
उभरती हुई बड़ी
अर्थव्यवस्था
है। 2047 तक भारत
एक विकसित
राष्ट्र बनने
का लक्ष्य रखता
है। 2047 तक भारत
को विकसित
बनाने के लिए
प्रधानमंत्री
का जो आह्वान
था उनमें
उन्होंने यह
कहा कि, ‘‘इतिहास
हर देश को एक
ऐसा दौर देता
है जब वह अपनी
विकास यात्रा
को कई गुना आगे
बढ़ाता है। एक
तरह से, यह उस
देश का
स्वर्णिम युग (अमृतकाल) है।
यह भारत के
लिए स्वर्णिम
युग (अमृतकाल) है।
भारत के
इतिहास में यह
वह दौर है जब
देश एक बड़ी
छलांग लगाने
जा रहा है।
हमारे आस-पास
ऐसे कई देशों
के उदाहरण है, जिन्होंने
एक निश्चित
समय में इस
तरह की छलांग
लगाकर खुद को
विकसित किया
है। इसलिए मैं
कहता हूँ, यह भारत
के लिए भी सही
समय है। इमें
इस स्वर्णिम
युग के हर पल
का फायदा
उठाना है, हमें एक
पल भी बर्बाद
नहीं करना है।
इस अमृतकाल
में हम सबको
मिलकर यह
संकल्प लेना होगा
कि अब हम एक पल
गवाए बिना
भारत को
विकसित करने
के लिए तत्पर
हैं।’’
अनेक शोध
कार्यों से यह
प्रमाणित हुआ
है की प्रथम
शताब्दी से
लेकर 18वीं
शताब्दी तक
भारत दुनिया
का सिरमौर था, विश्व
की जीडीपी में
भारत का
सर्वाधिक
योगदान था।
परंतु जब भारत
को स्वराज
मिला उसे समय
भारत की
आर्थिक
स्थिति
अत्यधिक
कमजोर हो चुकी
थी। वर्तमान
में भारत एक
विकासशील देश है
जो तीव्र
आर्थिक
प्रगति के साथ
आगे बढ़ रहा है।
भारत के
विभिन्न
आर्थिक
समस्याओं के
व्यापक प्रयास
व्यक्तिगत
स्तर पर भी और
शासकीय स्तर पर
भी लगातार किए
जा रहे हैं, परंतु इसके
साथ-साथ
गांधीवादी
विकल्प एक
श्रेष्ठ
प्रयास सिद्ध
हो सकता है।
भारत की
आर्थिक
प्रगति के बावजूद
कई गंभीर
समस्याएँ आज
भी मौजूद हैं, जैसे
बेरोजगारी, गरीबी, असमानता, ग्रामीण-शहरी
विभाजन, और
संसाधनों का
असंतुलित
वितरण। इन
समस्याओं के
समाधान के लिए
गांधी के विचार
आज भी अत्यंत
प्रासंगिक और
उपयोगी माने जाते
हैं।
अध्ययन के
उद्देश्य
1.
गाँधीवादी
विकल्प के
माध्यम से
वर्तमान समस्याओं
को सुलझाना।
2.
आर्थिक
समस्या में
संदर्भ में
गाँधीवादी विकल्प
का अध्ययन।
3.
सामाजिक
विषमता के
संदर्भ में
गाँधीवादी विकल्प
का अध्ययन।
4.
निर्धनता व
बेरोजगारी के
संदर्भ में
गाँधीवादी
विकल्प का
अध्ययन।
5.
अनुसूचित
जाति, जनजाति
एवं पिछड़े
वर्ग के
अभ्युत्थान व
उत्पन्न
समस्या के
प्रसंग में
गाँधीवादी
अध्ययन।
6.
कालाबाजारी, भ्रष्टाचार
व
अप्रशिक्षित
कृषक व मजदूर
की समस्या का
नैदानिक
अध्ययन।
परिकल्पना
परिकल्पना
के रूप में
जिन
अनुत्तरित
प्रश्नों एवं
विचारों को
व्याख्या
प्रदान किया
जाना निश्चित
किया गया है
उसकी
व्याख्या इस
प्रकार की जा
सकती है-
1.
भारत की
समस्याओं का
समाधान
गांधीवादी
विकल्प के
माध्यम से हो
सकता है।
2.
गांधीवादी
विकल्प से
आर्थिक
समस्याओं के
समाधान के
सम्मुख आने
वाली
चुनौतियों का
सामना किया जा
सकता है।
3.
भारत की
आर्थिक
समस्याओं के
समाधान के
मार्ग में
प्रमुख बढ़ाएं
किस प्रकार
उत्पन्न हो
रही है?
4.
आर्थिक
समस्याओं के
समाधान हेतु
किए गए शासन के
प्रयास किस
स्वरूप में
सामने आए हैं?
शोध
प्रविधि
प्रस्तुत
शोध पत्र
मूलतः
द्वितीयक
सूचना
स्रोतों पर
आधारित है।
प्रस्तुत
अध्ययन की
वस्तुनिष्ठता
बनाए रखने के
लिए शासकीय और
अशासकीय
संस्थाओं के
द्वारा
प्रकाशित/अप्रकाशित
दस्तावेज, सांख्यिकी, आदेश, सूचना
आदि का उपयोग
किया गया है।
शोध अध्ययन पद्वति
में
आत्मनिष्ठ और
वस्तुनिष्ठ
अध्ययन
पद्धति को
अपनाया गया
जिसमें शोध विषय
से सम्बन्धित
ख्यातनाम
राजनीतिशास्त्रियों, शासकों, विधायकों, लेखकों, सामाजिक
कार्यकर्ताओं
इत्यादि की
पुस्तकों, लेखों, पत्र-पत्रिकाओं
की पाठ्य
सामग्री का
अध्ययन सम्मिलित
है।
गांधीवादी
अर्थशास्त्र
नैतिकता, आत्मनिर्भरता
और समानता पर
आधारित है।
गांधीवादी
अर्थशास्त्र
का केंद्र “मानव
कल्याण” है, न
कि मात्र
उत्पादन और
लाभ। यह “जरूरत
आधारित उपभोग” पर
बल देता है, न
कि “लोभ आधारित
उपभोग” पर।
इसका मुख्य
सिद्धांत है-सादगी, स्वावलंबन
और नैतिकता।
भारत की
आर्थिक समस्याओं
के समाधान में
गांधीवादी
दृष्टिकोण एक
प्रासंगिक
विकल्प बन
सकता है। भारत
की सभी प्रकार
की जैसे
राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक
व नैतिक आदि
समस्याओं के
समाधान में गांधीवादी
विकल्प
अत्यधिक
उपयोगी सिद्ध
हो सकता है।
भारत एक
विशाल और
विविधतापूर्ण
देश है, जहाँ
सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक
और
पर्यावरणीय
अनेक
समस्याएँ विद्यमान
हैं। गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक
असमानता, हिंसा, और
पर्यावरण
प्रदूषण जैसी
चुनौतियाँ
विकास के
मार्ग में
बाधा बनती
हैं। इन
समस्याओं के समाधान
के लिए गांधी
के विचार आज
भी अत्यंत प्रासंगिक
और मार्गदर्शक
हैं। भारत आज
विश्व की
उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं
में से एक है, फिर भी
इसके सामने
अनेक गंभीर
आर्थिक
समस्याएँ
विद्यमान हैं
जैसे
बेरोजगारी, आय-विषमता, ग्रामीण-शहरी
असंतुलन, संसाधनों
का असमान
वितरण, पर्यावरणीय
संकट और
उपभोक्तावाद
की बढ़ती प्रवृत्ति।
इन चुनौतियों
के समाधान के
लिए आधुनिक
आर्थिक नीतियों
के साथ-साथ नैतिक
एवं मानवीय
दृष्टिकोण की
भी आवश्यकता
है। ऐसे में
गांधीवादी
विचारधारा एक
वैकल्पिक और
टिकाऊ मार्ग
प्रस्तुत
करती है क्योंकि
गांधी का
आर्थिक चिंतन
केवल धन-संपत्ति
के उत्पादन तक
सीमित नहीं था, बल्कि यह
नैतिकता, सामाजिक
न्याय और
मानवीय
मूल्यों पर
आधारित था।
उनका
उद्देश्य ऐसा
आर्थिक ढांचा
बनाना था
जिसमें हर
व्यक्ति की
आवश्यकताएँ
पूरी हों और
समाज में
समानता
स्थापित हो।
गांधीवादी
समाधान
प्रकृति के
साथ संतुलित विकास, जैविक
खेती और
पारंपरिक
तकनीकों का
उपयोग व
प्रदूषण और
संसाधनों के
दोहन पर
नियंत्रण पर
बल देता है।
गाँधी भारत
में सभी
राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक
व नैतिक
समस्या का
शांतिपूर्ण
निदान चाहते
थे जिससे
प्रत्येक
नागरिक को
मानवता के
प्रति
भाइचाारे से
रहकर अपनी
प्रत्येक समस्या
को सुलझाने
तथा समायोजन
करने का
रास्ता मिल
सके। सत्य, अहिंसा, प्रेम, सहयोग
और सद्भावना
गाँधीवादी
मार्ग दर्शन के
मूल आधार हैं।
मानवीय जीवन
नाना प्रकार
की समस्याओं
से घिरा हुआ
है। इसमें
गाँधीवाद मनुष्य
को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक
व नैतिक
समस्याओं के
प्रति सकारात्मक
दृष्टिकोण
बताते हुए अन्तःकरण
की भावना से
प्रेरित करता
है। गाँधी राज्यविहीन
समाज की
स्थाना करना
चाहते थे। इसमें
सभी व्यक्ति
सामाजिक जीवन
का स्वयं अपनी
इच्छा से
नियमन करते है, मनुष्यों
का इतना अधिक
विकास हो जाता
है कि वे अपने
कर्तव्यों और
नियमों का
स्वेच्छा
पूर्वक पालन
करते हैं।
गाँधी
यथार्थवादी
होने के कारण
उन्होंने इस बात
को स्वीकार
किया है कि
मानव स्वभाव
की वर्तमान
स्थिति को
देखते हुए
पूर्ण आदर्श
की स्थापना
सम्भव नहीं है
इसलिए
व्यावहारिक
दृष्टिकोण से
उप आदर्श की
कल्पना की गई।
भारत की
विभिन्न
समस्याओं का
समाधान केवल
कानून और योजनाओं
से नहीं, बल्कि
नैतिक
मूल्यों और
जनभागीदारी
से संभव है।
गांधीवादी
विचारधारा
हमें सादगी, सत्य, अहिंसा
और
आत्मनिर्भरता
का मार्ग
दिखाती है।
यदि इन
सिद्धांतों
को अपनाया जाए, तो भारत
एक समृद्ध, शांतिपूर्ण
और
न्यायपूर्ण
राष्ट्र बन
सकता है। भारत
की आर्थिक समस्याओं
का एक प्रमुख
कारण अत्यधिक
केंद्रीकरण
है। गांधीजी
ने “ग्राम
स्वराज” की
अवधारणा दी, जिसमें
प्रत्येक
गाँव
आत्मनिर्भर
इकाई के रूप
में कार्य
करता है।
गांधीजी ने
स्थानीय उत्पादन
और उपभोग को
बढ़ावा देने, ग्रामीण
रोजगार के
अवसरों में
वृद्धि करने व
शहरों की ओर
पलायन में कमी
करने पर बल
दिया। गांधी
का यह मॉडल आज “लोकल
फॉर वोकल” और “आत्मनिर्भर
भारत” जैसी
नीतियों में
भी दिखाई देता
है। गांधी ने बड़े
उद्योगों के
विकास के साथ-साथ
कुटीर
उद्योगों की
उपेक्षा ने
बेरोजगारी और
असमानता को
बढ़ाया है।
गांधीवादी
समाधान के अनुसार
हस्तशिल्प, खादी, और लघु
उद्योगों को
बढ़ावा दिया
जाए व स्थानीय
संसाधनों का
उपयोग कर
रोजगार सृजन
किया जाए। जिससे
ग्रामीण
अर्थव्यवस्था
मजबूत होगी और
आर्थिक
संतुलन
स्थापित
होगा। गांधी
ने पूंजीपतियों
को समाज के
हित में कार्य
करने, धन का
न्यायसंगत
वितरण सुनिश्चित
करने व
कॉर्पोरेट
सामाजिक
उत्तरदायित्व
को नैतिक आधार
देने पर बल
दिया जिससे यह
सिद्धांत आज
के पूंजीवादी
ढाँचे में
सामाजिक न्याय
स्थापित करने
का मार्ग
दिखाता है।
गांधीजी ने “श्रम की
गरिमा” पर
विशेष बल देने, शिक्षा को
कौशल आधारित
बनाये देने, स्व-रोजगार को
प्रोत्साहित
किये जाने व
हर व्यक्ति को
उत्पादन
प्रक्रिया
में शामिल
किये जाने पर
बल दिया।
गांधी का
अर्थ-दर्शन
उनकी कथनी, करनी
एवं उनके यदा-कदा
लेखन के
माध्यम से रस-रस
टपककर निकाला
जा सकता है।
उन्होंने कोई
शोध नहीं
किया। उनका
कोई
सम्बन्धित
विश्लेषण भी
नहीं है। सच पूछा
जाय तो
अर्थशास्त्र
के रूप में
उन्होंने न तो
कोई बात हमारे
सामने रखी और
न ही उन्होंने
कभी ऐसा तर्क
प्रस्तुत
करने का प्रयत्न
किया जिससे
हमें यह लगे
कि वह
अर्थशास्त्र पर
कोई मीमांसा
करने जा रहे
हैं। परन्तु
फिर भी वह
अर्थवेŸाा थे और
उनका एक अर्थ-दर्शन है
जिसे आज क्या
कभी भी
झुठलाना आसान
नहीं होगा।
स्पष्टतः
तकनीकी
दृष्टि से
गांधी जी ने
भले ही
अर्थशास्त्र
की बात न की हो, परन्तु
उन्होंने
मानव जाति की
चेतना एवं अकांक्षा
को
सर्वसाधारण
तक पहुंचाने
में कभी भी चूक
नहीं की।
गांधी
न्यूनता, दरिद्रता, पद-दलिता, असुरक्षा, भय, हिंसा
और घृणा को
मानव-जाति के
लिए अभिशाप
मानते थे।
इन्हें दूर
करना हमार
लक्ष्य बताते
थे और इन्हीं
के आधापर पर
समय-समय पर
हमारे आज के
अर्थशास्त्रियों
को आड हाथों
लेते भी थे।
यहीं से उनका
अर्थ-दर्शन
प्रारंभ हुआ
और पना या यों
कहिए परवान चढ़ा।
गांधी
ने कभी
माक्र्स पर
बहस नहीं की।
न उन्होंने
मार्शल, स्मिथ, पिगू, राबिन्स, कीन्स
या सैंकड़ो
जाने-माने
अर्थशास्त्रियों
की बात को
झुठलाने या उनके
तर्कों को
आधार मानने की
ईच्छा ही
प्रकट की। वह
किसी देश-विदेश
की
चहारदीवारी
के मध्य भी
नहीं रहना चाहते
थे। उनके लिए तो
लन्दन के झोपङ-पट्टियों
में रहने वाला
व्यक्ति हो या
दक्षिणी
अफ्रीका का
गरीब खेतिहर
और मजदूर अथवा
हमारा अपना
अछूत। उनके
अर्थ-दर्शन
का क्षेत्र
व्यापक था, कार्यशाला
भले ही उनका
अपना भारत रहा
हो या कुछ हद
तक दक्षिणी
अफ्रीका। सभी
समान थे उनके
अर्थ-दर्शन में और सभी
उनके अपने थे।
गांधी के लिए
मानव-जाति का
केवल एक ही
चरित्र है-दैवी
चरित्र-जिसे
उसने प्रकृति
से प्राप्त
किया है, और
यही सत्य है।
इस सत्य को
आधार मानकर
उन्होंने
नैतिकता को
सर्वोŸाम
बताते हुए
संसार में
लिप्त रहने की
बात कही। जब
हम संसार में
रहेंगे तो ‘अर्थ’ से
हमार सम्बन्ध
अवश्य होगा।
यही गांधी का
अर्थ-दर्शन
सामने आता है।
गांधी ने
भारत की
दरिद्रता एवं
उससे उत्पनन पददलिता
के बारे में
एक बार कहा था
कि ‘‘इन मनुष्यों
का जीवन इतना
कठिन हो गया
है कि इनमें
से बहुत अपने
बच्चों को खो
देते हैं।, अपनी
बेटियों यहां
तक कि अपनी
पत्नियों को
शर्मनाक
स्थिति में
देखकर भी मूक
बने रहते हैं।’’ गांधी
का नैतिक मानव-कल्याण
मिश्रित अर्थ-दर्शन
यहीं से उभरता
है। गांधी के
लिए अर्थशास्त्र
‘मोक्ष
प्राप्ति का
एक वह विज्ञान
है जो उसकी भावनाओं
एवं नैतिकता
का अध्ययन
करके उसे सुख
एवं शान्ति देने का
प्रयत्न करता
है। गांधी के
अर्थ-दर्शन में
पूंजीवाद की
समाप्ति, श्रम
के कल्याण के
मूल्य पर
मशीनीकरण का
होना, प्राकृतिक
संसाधनों का
पूर्ण दोहन
एवं आवश्यकतानुरूप
सदुपयोग व
ट्रस्टीशिप
के सिद्धान्त
का पालन आदि
शामिल हैं।
गांधी
अर्थ-दर्शन का
सार हो या उसे
पूर्णता
प्रदान करने
एवं प्राप्ति
के लिए मार्ग
हो, अथवा मानव-प्रकृति
एवं व्यवहार
के आधार पर
अर्थ-दर्शन
की व्याख्या
हो या गांधी
के कथोक्तियांे
को आधार बनाना
हो
प्रत्यक्षतः
गांधी जी के आर्थिक
विचारधाराओं
को ‘सिद्धान्त
की परिधि’ में
बांधना चाह
रहे हैं । ऐसी
स्थिति में हम
यह कहने का
साहस जुटा पा
रहे हैं के
आर्थिक
विचारों के
अहिंसात्मक
स्वामित्व, उपयुक्त
तकनीकी
प्रयोग, स्वामित्व-त्याग, शोषण-रहित समाज
की स्थापना, सहयोग एवं
समानता व
अहिंसात्मक
श्रम आदि सिद्धान्त
थे जिन पर
उनका अर्थ-दर्शन
टिका हुआ है।
भारत तीव्र
आर्थिक
प्रगति के साथ
आगे बढ़ रहा
है। राष्ट्रीय
आय भी बढ़ी है।
राष्ट्र आत्म-निर्भरता
की ओर भी बढ़ा
है। परन्तु इन
सबके बाद भी
क्या हम यह
दावा करने में
असमर्थ हैं कि
इन उपलब्धियों
का लाभ उन तक
पहुंचा है
जिसका वास्तव
में इन
उपलब्धियों
को प्राप्त
करने में सम्पूर्ण
सहयोग है और
जिन पर उनका
अधिकार भी है।
उŸार
कम-से-कम
सकारात्मक तो
नहीं ही हो
सकता। आज के
अर्थशास्त्र
में,
संसाधन
सीमित हैं और
आवश्यकताएं
अनन्त, जीवन का
लक्ष्य
अधिकाधिक
उपभोग है, अर्थ-सुख ही
उपभोग का
लक्ष्य है, और
आधार भी व
अनन्त
आवश्यकताओं
की पूर्ति ‘उपयोगिता’ के
कारण संभव है
जबकि गांधी के
अर्थ-दर्शन
में मूल
आवश्यकताओं
की पूर्ति ही
उपभेक्ता का
लक्ष्य है, आवश्यक
भौतिक सुख से
ऊपर ‘उपयोगिता’ अर्थहीन
है,
वैयक्तिक
उपभोग-सुख एक-दूसरे
पर आश्रित हैं
व पर्याप्तता
की स्थिति के
पश्चात्
बाहुल्य की
स्थिति भयावह
है आदि
शामिल हैं।
गांधी ने
जब उपभोग को
मात्र मोक्ष
का एक साधन माना
तो वहीं
उन्होंने
पूंजीवादी
समाज की भत्र्सना
भी की और
उत्पादन के
घटकों का
विकेन्द्रीकरण
करके धन के
ऐसे सार्थक
उपयोग का पक्ष
लिया, जिसमें
शोषण समाप्त
हो, ‘शोषक एवं
शोषित’ शब्दों की
समाप्ति हो और मानव-जाति की
न्यूनता की
दलदल से निकाल
ऐसी पर्याप्तता
की ओर ले जाया
जा सके जिससे
उसको आत्म-सुख
का अनुभव हो।
गांधी के
उत्पादन
साधनों में ‘शोषण-रहित’ साधनों
के प्रयोग पर
बल दिया गया
है
आज के
अर्थशास्त्र
में लाभ को
मद्देनजर
रखकर उत्पादन
करना, उत्पादन-क्षमता
द्वारा
उत्पादन-मात्रा का
निर्धारण
होता है, औद्योगीकरण
एक वरदान माना
जाता है, पूर्ण
रोजगार संभव
नहीं है, पंूजी
अनिवार्य घटक
है, तकनीक का
प्रयोग लगभग
अनिवार्य मान
लिया गया है व
क्रय-शक्ति
रखने वालों के
लिए उत्पादन
करना आदि शामिल
हैं जबकि
गांधी के अर्थ-दर्शन
में वैयक्तिक
एवं सामाजिक
संतुष्टि के
लिए उत्पादन
करना, भौतिक
उन्नति की ओर
उन्नमुखता
नहीं वरन् उन्नति
की ओर
उन्मुखता
आर्थिक
क्रियाओं का
मुख्य लक्ष्य
है, आत्म-निर्भरता
के लिए
उत्पादन करना, पूंजी गौण
घटक है, रोजी-रोटी
श्रम का अपना
मूल्य है, तकनीक
का प्रयोग वहीं
तक वांछनीय है
जहां तक वह
मानव-जाति की
सहायक है व
लागत को ध्यान
में न रखते हुए
पूर्ण रोजगार
संभव है आदि
शामिल हैं।
भारत की
सोच, आर्थिक
आकांक्षा एवं
आर्थिक
आवश्यकता के
संदर्भ में यह
न मानना
हठधर्मी होगी
कि हम वर्तमान
पश्चिमी
अर्थशास्त्रियों
पर बहुत अधिक निर्भर
करने लगे हैं
और अपनी
संस्कृति, परम्परा
तथा धरोहर की
ओर से ध्यान
देने को ‘परम्परावादी
या रूढ़िवादी’ की
संज्ञा से
सम्बोधित
करने लगे हैं।
पश्चिम से जो
कुछ भी आया है, वह आधुनिक है
और हमारा जो
है, वह
दकियानूसी है, परम्परावादी
है और कुछ की
नजरों में ‘घड़ी को पीछे
करने’ की एक
साजिश है।
गांधी का अर्थ-दर्शन
हमंे इनसे
छुटकारा
दिलाकर यह
बताता है कि न
तो उनका अर्थ-चिन्तन
परम्परावादी
है और न ही वह
आधुनिकता से
परे है। वह तो
यथार्थ है और
उसी से समूचे
भारत का ही
नहीं वरन्
मानव-जाति के
कल्याण का
मार्ग
प्रशस्त
होगा। भारतीय समाज
के शोषण एवं
सामाजिक
असमानता को
दूर करना
गांधी का पहला
कर्Ÿाव्य था।
वह समझते थे ‘स्वराज’ स्वतंत्रता-प्राप्ति
से नहीं हमारी
आर्थिक दासता
को दूर करने
से आयेगा।
गांधी की
सीमित आवयकता
की परिभाषा
तले गांधी का
अर्थ-दर्शन
फलता-फूलता
है। भारतीय
परम्परा सन्तोष
में विश्वास
करती है और
यही किसी भी
अर्थ-जगत के
विकास का
मार्ग
प्रस्तुत
करता है। जब सन्तोष
होगा तो भौतिक
सुखों के
स्थान पर समाज, राष्ट्र, आत्मा
एवं सत्य सबसे
आगे रहेगा।
हमें जो कुछ भी
प्राप्त करना
है, उत्पादन
करना है, उपभोग
करना है, वितरित
करना है, उन सबके
पीछे
व्यक्तिगत
उन्नति के साथ-साथ
सामाजिक एवं
राष्ट्रीय
उन्नति का भी
ध्येय होना
चाहिए। जब यह
ध्येय होगा तो
व्यक्तिगत
उन्नति
सन्तोष का
स्थान नहीं ले
पायेगी, वरन्
सन्तोष तब
होगा, जब हमारे
चारों ओर सभी
सुख की
प्राप्ति
करें, और जब ऐसा
होगा, तो समाज
उन्नति करेगा
और राष्ट्र
आगे बढ़ेगा।
गांधी जी के, ही
शब्दों में
हमें ऐसे समाज
का निर्माण
करना है
जिसमंे
आर्थिक
उद्देश्यों
पर अंकुश रखा
जा सके।
गांधी का
अर्थ-दर्शन यह
सब कुछ करने
में सक्षम है।
हमारी आवयकता
केवल इतनी है
कि हम अपने को
सुनियोजित
ढंग से
ग्रामीण व्यवस्था
की पुरानी
आर्थिक
पद्धति की ओर
ढकेलकर ले
जाएं-जहां
आत्मनिर्भरता
थी,
संतोष
था और मानव-जाति के
सम्पूर्ण
विकास का
पूर्ण अधिकार
था। हमें अपनी
संस्कृति एवं
सभ्यता का
पल्लू पकड़ना
पड़ेगा। इसी
में हमारे साथ-साथ
सम्पूर्ण
विश्व की भलाई
है और मानव
जाति के सम्पूर्ण
विकास का
गौरवमय अवसर।
इतिहास इसका
साक्षी है।
भारत की
आर्थिक
समस्याओं का
समाधान केवल
नीतियों से
नहीं, बल्कि सोच
और जीवनशैली
में बदलाव से
संभव है। गांधीवादी
दृष्टिकोण
हमें सिखाता
है कि नैतिकता, समानता
और
आत्मनिर्भरता
के आधार पर एक
सशक्त और
समृद्ध भारत का
निर्माण किया
जा सकता है।
आज के समय में
गांधीजी के
सिद्धांतों
को अपनाकर हम
एक संतुलित और
न्यायपूर्ण
अर्थव्यवस्था
की दिशा में
आगे बढ़ सकते
हैं।
निष्कर्ष
भारत की
आर्थिक
समस्याएँ
केवल नीतिगत
बदलाव से हल
नहीं हो सकती
इसके लिए
मूल्य-आधारित
परिवर्तन
आवश्यक है। गांधीवादी
विचारधारा
हमें सिखाती
है कि विकास
का वास्तविक
उद्देश्य
मानव कल्याण
और सामाजिक
न्याय होना
चाहिए। यदि
भारत
गांधीवादी सिद्धांतों
जैसे ग्राम
स्वराज, स्वावलंबन, ट्रस्टीशिप, और
नैतिक उपभोग
को अपनाए, तो वह न
केवल अपनी
आर्थिक
समस्याओं का
समाधान कर
सकता है, बल्कि
एक संतुलित, समावेशी
और टिकाऊ
विकास मॉडल भी
प्रस्तुत कर सकता
है। इस प्रकार, गांधीवादी
समाधान आज भी
प्रासंगिक
हैं और भारत
के उज्ज्वल
आर्थिक
भविष्य की
दिशा में मार्गदर्शक
सिद्ध हो सकते
हैं।
सन्दर्भ
सूची
1.
एम.के. गाँधी: ‘‘आत्मकथा‘‘, सस्ता
साहित्य
मण्डल, नई
दिल्ली, 1940
2.
एम.के. गाँधी: ‘‘गाँधी
शिक्षा‘‘, सस्ता
साहित्य
मण्डल, नई
दिल्ली, 1950
3.
एम.के. गाँधी: ‘‘धर्म
नीति‘‘, सस्ता
साहित्य
मण्डल, नई
दिल्ली, 1947
4.
एम.के. गाँधी: ‘‘मेरा
धर्म‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद,
1958
5.
एम.के. गाँधी: ‘‘रचनात्मक
कार्यक्रम‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद,
1951
6.
एम.के. गाँधी: ‘‘मेर
सपनो का भारत‘‘, सर्वे सेवा
संघ प्रकाशन, वाराणसी,
1983
7.
एम.के. गाँधी: ‘‘मेरे
सत्य के
प्रयोग‘‘ नवजीवन
प्रकाशन
ट्रस्ट
अहमदाबाद, 2
संस्करण 1950
8.
एम.के. गाँधी: ‘‘खादी
क्यों और कैसे‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद,
1957
9.
एम.के. गाँधी: ‘‘संरक्षकता
का सिद्धान्त‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद,
1960
10.
एम.के. गाँधी: ‘‘ट्रस्टीशिप‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद,
1960
11.
एम.के. गाँधी: ‘‘सर्वोदय‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद,
1960
12.
श्री
सिद्वराज
ढड्ढ़ा: ‘‘वैकल्पिक
समाज रचना‘‘, सर्व
सेवा संघ
प्रकाशन, वाराणसी
13.
जयदेव सेठी: ‘‘गाँधी
की
प्रासंगिकता‘‘, राधाकृष्णन्
प्रकाशन, नई
दिल्ली
14.
डॉ.
बाबूराम
मिश्र: ‘‘भूदान का
आर्थिक आधार‘‘, नागरी
प्रचारणी सभा-वाराणसी, 1970
15.
डॉ.
धीरेन्द्र
मोहनदा: ‘‘महात्मा
गाँधी का
दर्शन‘‘, बिहार
हिन्दी ग्रंथ
अकादमी, पटना,
1981
16.
प्रो. के. एल. कमल: ‘‘
गाँधी
चिन्तन‘‘, पब्लिशिंग
हाऊस, जयपुर