पर्यावरण
संरक्षण एवं
गांधीवादी
दृष्टिकोण
डॉ.
अशोक कुमार
महला1*, डॉ.
सुलोचना2
1 सहायक
आचार्य, राजनीति
विज्ञानए
राजकीय कला
महाविद्यालय, सीकर, राजस्थान
drashokmahala@gmail.com
2 सहायक
आचार्य, राजनीति
विज्ञान, एस.
के. राजकीय
कन्या
महाविद्यालय, सीकर, राजस्थान
सारांश
पर्यावरण
राजनीतिक
विश्लेषण में
एक नये सामाजिक
सरोकार के
नवीन मुद्दे
के रूप में 1970 के
दशक के बाद से
अध्ययन में
जुङा। 1970 के दशक
के आते-आते
औद्योगिकीरण की
होङ के
परिणामस्वरूप
भौतिक एवं
जैवकीय पर्यावरण
क्षरण, पर्यावरण
प्रदूषण, पर्यावरण
संरक्षण की समस्याऐं
उभरने लगी।
परिणामस्वरूप
पर्यावरण एक
अन्र्तविषयी
एवं बहुमुखी
समस्या के रूप
में उभर कर
आने लगा जिसने
राजनीतिक
क्षेत्र में
स्थानीय, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय
एवं वैश्विक
स्तर पर
चिन्तन, मनन
एवं कर्म की
दिशा प्रशस्त
की। पर्यावरण
के अन्र्तगत
सभी जैविक व
अजैविक घटकों
का समावेश है।
पर्यावरण
हमारे जीवन का
आधार है।
इसलिए
पर्यावरण का
संतुलन बनाए
रखना अत्यंत
आवश्यक है।
पर्यावरण
संरक्षण का अर्थ
है कि प्रकृति
और उसके
संसाधनों, जैसे
हवा, पानी, जंगल, जीव-जंतु
आदि की रक्षा
करना, ताकि
जीवन संतुलित
और सुरक्षित
बना रहे। किंतु
आधुनिक विकास
की अंधी दौड़
ने पर्यावरण
को गंभीर संकट
में डाल दिया
है। ऐसे समय
में पर्यावरण
की सुरक्षा
अत्यंत
आवश्यक हो
जाती है। पर्यावरण
की सुरक्षा के
संदर्भ में
महात्मा गांधी
का दृष्टिकोण
अत्यंत
प्रासंगिक
है।
मुख्य शब्द : पर्यावरण, पर्यावरण
संरक्षण, पर्यावरणवादी, वैश्विक, जैविक-अजैविक
घटक, ग्लोबल
वार्मिंग, सतत
विकास, आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण, लोककल्याणकारी, राजनीतिक
विश्लेषण, वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण, पर्यावरणीय
संरक्षण, पारिस्थितिकी, नवीकरणीय
ऊर्जा स्रोत व
वैदिक
संस्कृति।
प्रस्तावना
पर्यावरण
से तात्पर्य
हमारे आस-पास
के उस वातावरण
से है जो हमें
चारों ओर से
घेरे हुए है व
जिसमें जीव
निवास करते
हंै।
पर्यावरण सभी
जैविक एवं
अजैविक
अवयवों का
सम्मिश्रण है
जो जीवों को
चारों ओर से
प्रभावित
करता है।
पर्यावरण से
आशय हमारे
चारों ओर
मौजूद उन सभी
चीजों, परिस्थितियों
और तत्वों से
है जो जीवन को
प्रभावित
करते हैं।
इसमें जीवित
और निर्जीव
दोनों प्रकार
के घटक शामिल
होते हैं।
वस्तुतः पर्यावरण
जैविक एवं
अजैविक घटकों
का वह समूह है जो
हमें चारों ओर
से ढ़के हुए
हैं तथा सभी
जीवधारियों
की क्रियाओं
और व्यवहारों
को प्रभावित
करता है।
पर्यावरण के
अन्र्तगत सभी
जैविक व
अजैविक घटकों
का समावेश है।
मनुष्य
के समान
पर्यावरणीय
तंत्र में न
केवल प्राकृतिक
और जैवीय
मण्डलों की
महत्तवपूर्ण भूमिका
है बल्कि मानव
निर्मित
विभिन्न पर्यावरण
परिवेश भी
सम्मिलित हैं, जैसे
आध्यात्मिक
पर्यावरण, सामाजिक
पर्यावरण, दार्शनिक
पर्यावरण, सांस्कृतिक
पर्यावरण, सामाजिक
पर्यावरण, शैक्षणिक
पर्यावरण, राजनीतिक
पर्यावरण व
संचार
पर्यावरण
आदि। पर्यावरण
हमारे जीवन का
आधार है। हम
जो हवा में
साँस लेते हैं, जो पानी
पीते हैं और
जो भोजन करते
हैं, यह सब
पर्यावरण से
ही प्राप्त
होता है।
इसलिए पर्यावरण
का संतुलन
बनाए रखना
अत्यंत
आवश्यक है। आज
के समय में
बढ़ता प्रदूषण
और प्राकृतिक
संसाधनों का
अंधाधुंध
उपयोग
पर्यावरण के
लिए गंभीर
खतरा बन गया
है। ऐसी
स्थिति में इस
संदर्भ में
महात्मा
गांधी का
दृष्टिकोण
अत्यंत प्रासंगिक
और
प्रेरणादायक
है।
अध्ययन
के उद्देश्य
1. अध्ययन का
उद्देश्य
पर्यावरणीय
वैश्विक संदर्भ
में विकास के
परंपरागत
प्रतिमानों
की असफलता के
कारण एवं उससे
उत्पन्न हुए
दुष्परिणामों
को समझना है।
2. गांधीवादी
विकल्प के
माध्यम से
पर्यावरणीय समस्याओं
को सुलझाना।
3. पर्यावरण
तथा प्रदूषण
जनित समस्या
के संदर्भ में
गांधीवादी
विकल्प का
अवलोकन करना।
4. पर्यावरण
की सुरक्षा
एवं सतत विकास
दोनों में
गांधीवादी
विकल्प के
माध्यम से किस
प्रकार समन्वय
हो सकता है का
अध्ययन करना।
परिकल्पना
परिकल्पना
के रूप में
जिन
अनुत्तरित प्रश्नों
एवं विचारों
को व्याख्या
प्रदान किया
जाना निश्चित
किया गया है
उसकी
व्याख्या इस
प्रकार की जा
सकती है-
1. अति
औद्योगीकरण
का क्या
विकल्प हो
सकता है।
2. पर्यावरण
सुरक्षा के
लिए
अंतरराष्ट्रीय
और व्यक्तिगत
स्तर पर किए
गए सारे
प्रयास कैसे असफल
सिद्ध हो रहे
हैं।
3. गांधीवादी
विकल्प से
पर्यावरण के
सम्मुख आने
वाली चुनौती
का सामना किया
जा सकता है।
शोध
प्रविधि
प्रस्तुत
शोध पत्र
मूलतः
द्वितीयक
सूचना स्रोतों
पर आधारित है।
प्रस्तुत
अध्ययन की वस्तुनिष्ठता
बनाए रखने के
लिए शासकीय और
अशासकीय
संस्थाओं के
द्वारा
प्रकाशित/अप्रकाशित
दस्तावेज, सांख्यिकी, आदेश, सूचना
आदि का उपयोग
किया गया है।
पर्यावरण
संरक्षण का
मतलब है कि
प्रकृति और उसके
संसाधनों, जैसे
हवा, पानी, जंगल, जीव-जंतु
आदि की रक्षा
करना, ताकि जीवन
संतुलित और
सुरक्षित बना
रहे। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण
और जनसंख्या
वृद्धि के
कारण वायु
प्रदूषण, जल प्रदूषण
और भूमि
प्रदूषण तेजी
से बढ़ रहे हैं।
इससे मानव
स्वास्थ्य पर
भी गंभीर
प्रभाव पड़ रहा
है, जैसे
श्वसन रोग, जलजनित
बीमारियाँ और
जलवायु
परिवर्तन के
खतरे आदि।
पर्यावरण की
रक्षा के लिए
हमें कई कदम
उठाने चाहिए, जैसे
सबसे पहले, वृक्षारोपण
को बढ़ावा देना
चाहिए
क्योंकि पेड़
वायु को शुद्ध
करते हैं और
कार्बन
डाइऑक्साइड
को अवशोषित
करते हैं।
इसके अलावा, हमें जल
संरक्षण करना
चाहिए और
अनावश्यक पानी
की बर्बादी से
बचना चाहिए।
प्लास्टिक का
कम उपयोग और
पुनर्चक्रण
(रीसाइक्लिंग)
को अपनाना भी
बहुत जरूरी
है। ऊर्जा के
नवीकरणीय स्रोतों
जैसे सौर और
पवन ऊर्जा का
उपयोग बढ़ाना
चाहिए। सरकार
के साथ-साथ
प्रत्येक
नागरिक की भी
जिम्मेदारी
है कि वह
पर्यावरण
सुरक्षा में
अपना योगदान
दे। हमें अपने
दैनिक जीवन
में छोटे-छोटे
बदलाव लाने
चाहिए, जैसे बिजली
की बचत करना, सार्वजनिक
परिवहन का
उपयोग करना और
स्वच्छता
बनाए रखना।
पर्यावरण
संरक्षण के
लिए निम्नलिखित
कदम उठाए जा
सकते हैं, जैसे
वनीकरण को
बढ़ावा देना, नवीकरणीय
ऊर्जा
स्रोतों का
उपयोग करना, प्रदूषण
नियंत्रण के
कड़े नियम लागू
करना, जन
जागरूकता
बढ़ाना, कचरा प्रबंधन
और
पुनर्चक्रण
को अपनाना।
पर्यावरण
संरक्षण पर
विश्व का
ध्यान द्वितीय
विश्व युद्ध
की समृद्धि के
कुछ वर्षों के
बाद गया। यह
भी समझ में
आया कि
हालांकि इस
दिशा में
व्यक्तिगत व
सामूहिक
प्रयास
उपयोगी है परन्तु
आवश्यकता
अंतर्राष्ट्रीय
स्तर पर प्रयास
करने की भी है।
इस उद्देश्य
से लेक सेक्स
सम्मेलन, 1949, मानवीय
पर्यावरण पर
स्टाॅमहोम
सम्मेलन, 1972, अर्जेण्टीना
में संयुक्त
राष्ट्र जल
सम्मेलन, 1977, नैरोबी
घोषणा, 1982, पर्यावरण
पर संयुक्त
राष्ट्र
विशिष्ट समिति, 1984, रिओ
पृथ्वी
सम्मेलन, जून 1992, संयुक्त
राष्ट्र पृथ्वी
शिखर सम्मेलन, जून 1997, ग्लोबल
वार्मिंग पर
अंतर्राष्ट्रीय
सम्मेलन, क्योटो
संधि-दिसम्बर 1997, जोहान्सबर्ग
में सतत विकास
पर सम्म्ेलन, 2002, संयुक्त
राष्ट्र
जलवायु
समझौता
सम्मेलन, दिसम्बर 2005
आदि
अंतर्राष्ट्रीय
स्तर पर
प्रयास किये
गए परन्तु
अधिकतर देश मात्र
नाम के लिए
उनमें
सम्मिलित हुए
व पर्यावरण
संरक्षण के
लिए उनकी
प्रतिबद्धता
वास्तविकता
में नहीं थी।
ऐसे में
पर्यावरण
संरक्षण की
आवश्यकता
पहले से अधिक
बढ़ गई है।
हमें आज अणु
बाहुल्य से डर
लग रहा है।
अपने
प्राकृतिक संसाधनों
में दु्रवगति
से आती कमी से
हम भयभीत हैं।
संसार, विशेषतः
पूर्वी-दक्षिणी
एशिया, के
जनसंख्या
विस्फोट से हम
मृत्यु की
भांति चिन्तित
हैं, आधुनिक
सभ्यता के
विस्तार से हम
शंकित हैं और औद्योगिक
उन्नति-जनित
प्रदूषण हमें
निगलता जा रहा
है। ऐसी
स्थिति में इस
संदर्भ में
महात्मा
गांधी का
दृष्टिकोण
अत्यंत
प्रासंगिक और
प्रेरणादायक
है। ऐसे में
इस समस्या को
गांधी के
दृष्टिकोण से
देखना आवश्यक
है।
गांधीजी
हमेशा सर्व
सम्पन्न
राष्ट्र की
कामना करते थे, वे हमेशा
राष्ट्र को
अनेक
समस्याओं से
निकलने व
समस्याओं को
मिटाने में
सक्षम करना
चाहते थे।
गाँधीवादी
दर्शन में
प्राचीन भारत
की संस्कृति
का तथा वैदिक
संस्कृति का
भी काफी
प्रभाव पड़ा।
महात्मा गांधी
पर्यावरण एवं
प्रकृति के
महान चिन्तक
थे। भारत की
स्वतंत्रता
में
महत्त्वपूर्ण
भूमिका अदा
करने वाले
महान चिन्तक व
राष्ट्रपिता पर्यावरण
एवं प्रकृति
के घोर पक्षधर
थे। उन्होंने
प्रत्येक
नागरिक के
साथ-साथ
सम्पूर्ण विश्व
को पर्यावरण
के प्रति
जागरूक रहने
का संदेष
दिया। गांधी
जी स्वयं जीवन
भर प्रकृति के
सबसे निकट
सम्पर्क में
रहे। अफ्रीका
में टालस्ट्वाय
फार्म पर या
फोनिक्स
आश्रम में, भारत में
साबरमती तथा
वर्धा या अन्य
गांवों के आश्रमों
में उन्होंने
ग्रामोद्योग
और खेती के समन्वित
कार्यक्रम
चलाए।
गांधीजी का
संसाधनों के
उचित उपयोग के
संबंध में मत
था कि प्रकृति
ने हमारी
बुनियादी
आवश्यकताओं
को पूरा करने
के लिए
पर्याप्त
साधन दे दिए
हैं। पर मानव
के लालच की
कोई सीमा नहीं, इसलिए
सम्पूर्ण विश्व
प्राकृतिक
साधनों का
संहार करने
में लगा है।
वर्तमान जीवन
जटील होता जा
रहा है। समस्या
व्यापक होती
जा रही है। इस
आणविक युग में
मनुष्य जीवन
की समस्याएं
गाँधी मार्ग
द्वारा ही दूर
हो सकती हैं।
इस
समस्या से
निजात इसलिए
नहीं मिल पा
रही है कि सभी
देश चाहते हैं
कि वे स्वयं
जो कर रहे हैं
करते रहें व
दूसरे देश
पर्यावरण को
बचाने के लिए
सभी जरूरी
उपाय करें।
दूसरों को यह
समझाया जाता
है कि इस
समस्या के लिए
वे ही
उत्तरदायी
हैं। जबकि
गांधी का तरीका
इसके बिल्कुल
विपरीत था। वे
कहते थे कि जो
दूसरों से
चाहते हो वह
तुम स्वयं करो।
तुम्हारे ऐसा
करने पर दूसरो
को भी अपनी जिम्मेदारी
का अहसास
होगा। कहा जा
सकता है कि पर्यावरण
संरक्षण के
लिए केवल
गांधी का
तरीका ही
सफलता दे सकता
है क्योंकि
संसार गांधी
दर्शन की ओर
उन्मुख है।
भारत कल भी
गांधी-दर्शन का
हामी था, उनके
जीवनकाल में
तो उन्हें सिर-माथे
पर बैठाया ही, उनके बाद भी
उनमें सारी
आस्था बनी हुई
है। हम ‘गांधी’
की ओर बढ़ रहे
हैं- अपने को
सुरक्षित करने
के लिए, अपने
मूल्यों को
बचाने के लिए
और अपने
भविष्य को
भयाक्रान्त
नहीं वरन्
स्नेहसिक्त
बनाने के लिए।
गांधी
पिछड़ेपन का
नहीं
आधुनिकता का प्रतिनिधित्व
करते हैं।
विकास
के प्रश्न को
सुलझाने हेतु
आज तक बहुत से
अंशतः सफल
प्रयास
सैद्धान्तिक
स्तर और व्यावहारिक
स्तर पर किए
गए हैं।
प्रसिद्ध
अर्थशास्त्री
जैसे
एम.पी.टोडारो, ए.जी. फ्रेंक, जी.रेन्स
आदि ने विकास
के सिद्धान्त
को आर्थिक
वृद्धि, आय की समानता, रोजगारोत्पादन
आदि के
संदर्भों में
समझा है, वहीं
हंटिगटन, ल्युसियन
पाई, वर्बा
आदि
राजमर्मज्ञों
ने इसे
राजनीतिक सहभागिता, लोकतंत्रीकरण, संस्थायन, लौेकिकीकरण
आदि के रूप
में समझा है।
वहीं समाजशास्त्री
विकास का
तात्पर्य
प्रजातीय अभिकृतियों, शहरीकरण, सामाजिक
परिवर्तन आदि
के रूप में
समझते हैं। इस
संदर्भ में
महात्मा
गांधी का
दृष्टिकोण
प्रासंगिक है, ऐसे में
विकास के
प्रश्न को
सुलझाने हेतु
गांधी के
दृष्टिकोण से
देखना आवश्यक
है। गांधीवादी
विकल्प में
राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व
नैतिक
व्यवस्था को
सम्पूर्ण
समाज में प्रत्येक
व्यक्ति का
अपने
व्यक्तिगत
हित, सामूहिक
हित पर
प्रधानता
प्रदान करने
में सहायता
करती है।
गांधीजी
कहते थे कि
हमें दूसरे
क्या कर रहे
हैं ये नहीं
देखना चाहिए
बल्कि हम क्या
कर रहे हैं ये
देखना चाहिए।
पर्यावरण
संरक्षण की
समस्या ये है
कि प्रदूषण है
ये सभी मान रहे
हैं पर कौन
जिम्मेदार है
इस पर विवाद
है। विकसित
देश विकासशील
देशों को दोष
देते हैं तो विकासशील
देश विकसित
देशों को। इस
बीच प्रदूषण
बढ़ता जा रहा
है। क्या
बेहतर तरीका
गांधी का नहीं
कि, हर देश
स्वयं को देखे
कि वो कहां
गलत कर रहा है और
कहां सुधार कर
सकता है।
अर्थात्
गांधी की भाषा
में जो दूसरों
से चाहते हो
वो पहले स्वयं
करो।
उदाहरण
के लिए वनों
की अंधाधुंध
कटाई के कारण ग्लोबल
वार्मिंग के
कारण तप रही
धरती को ब्राजील
ने अच्छी खबर
दी थी। अगस्त 2008 से
जुलाई 2009 तक
यहां पर वनों
की कटाई में 46 फीसदी
की कमी आई थी।
आंकड़ों के
अनुसार पिछले
बीस वर्षो में
यह दर सबसे कम
रही थी।
ब्राजील के
राष्ट्र्ीय
अंतरिक्ष शोध
संस्थान ने
अपनी रिपोर्ट
में कहा था कि
इस वर्ष 7,008 स्क्वायर
किलोमीटर की
जमीन पर ही
जंगलों की कटाई
की गई। 1988 में
जब से यहां
सरकार ने
जंगलों की
निगरानी के
लिए नियम बनाए
थे, तब से
यह दर सबसे कम
थी। देश के
राष्ट्रपति
लुईस इनासियो
लूला डि
सिल्वा ने इन
आंकड़ों पर खुशी
जताते हुए कहा
था कि यह देश
के साथ ही
पर्यावरण के
लिए भी खुशी
की बात है।
गौरतलब है कि 2004 में
अमेजन
क्षेत्र में
सख्ती दिखाते
हुए इसकी
निगरानी कड़ी
कर दी थी और
आर्थिक दंड भी
बढ़ा दिया गया
था। सरकार के
अनुसार यही
कारण है कि
यहां पर अब
लोग वनों की
कटाई करने से
कतरा रहे थे।
बाजील के
अमेजन के
हिस्से में
वनों की कटाई
के कारण ही 70 फीसदी
ग्रीन हाउस
गैसों का
उत्सर्जन
हुआ।
ऐसे
कुछ प्रयास
कुछ देशों
द्वारा किए
जाएं तो अन्य
देशों को
प्रेरणा
मिलेगी व वे
स्वयं आगे आकर
पर्यावरण
संरक्षण के
लिए कदम
उठाएंगे। अतः
गांधी का
मार्ग ही इस
संबंध में
सर्वाधिक
उचित है कि हर
देश स्वयं वह
करे जो वो
चाहता है कि
दूसरे करें।
हालांकि
कुछ देश हठीला
रूख अपना रहे
हैं और उनके
कारण माहौल
बिगड़ता है।
हालांकि सभी
देशो में इस
बात की आम
सहमति है कि
जलवायु
परिवर्तन के
संकट की
उपेक्षा नहीं
की जा सकती, लेकिन इस
ममसले पर
मिलकर काम करने
की
इच्छाशक्ति
नदारद है।
गरीब देशों का
तर्क है कि
धनवान देश
प्रदूषण के
लिए सबसे ज्यादा
जिम्मेदार
हैं, इसलिए
हरित तकनीकी
में
रूपान्तरण और
कार्बन उत्सर्जन
में कटौती के
लक्ष्य को
हासिल करने के
लिए उन्हें
वित्तीय और
प्रौद्योगिकीय
मदद करनी चाहिए।
धनवान देश चाहते
हैं कि सारी
दुनिया
विषेशकर भारत
और चीन जैसी
उभरती हुई
अर्थव्यवस्थाओं
को भी इस संसार
को हरित
दुनिया में
बदलने अभियान
में अपनी
भागीदारी
निभानी
चाहिए। गरीब
और अमीर सभी देशों
में इस बात को
लेकर आशंका और
डर व्याप्त है
कि कार्बन
उत्सर्जन में
कटौती का असर
उनकी
अर्थव्यवस्थाओं
पर पड़ेगा।
नेताओं और उनके
वैज्ञानिक
सलाहकारों को
समझना होगा कि
पर्यावरण
अनुकूल
आर्थिक विकास
में कहीं अधिक
रोजगार का
सृजन हो सकेगा
और ऐसा विकास
अधिक टिकाउ भी
होगा। सच तो
यह है कि
पर्यावरण
सरंक्षण के
मुद्दे को समझ
लेंगे तो
राजनेता अपने
आप उसका
अनुसरण करने
लगेंगे।
यह भी
सच है कि आज
कुछ राष्ट्र
भी ईमानदारी
से इस कार्य
को करेंगे तो
इसकी भी
प्रतियोगिता
प्रारंभ हो
जाएगी।
फिलहाल तो
राष्ट्रों
में बचने की
प्रतियोगिता
चल रही है।
इसे ही बदलने
की आवश्यकता
है। कुछ
विद्वानों का
मत है कि ग्लोबल
वार्मिंग एक
ओर बढ़ती
औद्योगिक
तकनीक और
अधिकाधिक
व्यापार
उत्पादन करने
एवं विश्व
संगठनों के
अत्यधिक दोहन
का प्रश्न है
वहीं दूसरी ओर
न केवल मानवता
को बल्कि पूरी
वसुधा को
समुद्र में
डूबने से
बचाने और इस
तरह समस्त अस्तित्व
को बचाए रखने
की चुनौती है।
कुछ विद्वानों
का मानना है
कि यह मूलतः
विज्ञान के
दुष्प्रभावों
को भली प्रकार
समझते हुए विकसित
देशों के
आत्म-नियंत्रण
से जुड़ी हुई
समस्या है।
विकासशील और
अल्प विकसित
देशों का यह दायित्व
है कि वे
पर्यावरण
संबंधी
अंतरराष्ट्रीय
सम्मेलनों
में ग्लोबल
वार्मिंग के
प्रश्न को न
केवल अधिक
गंभीरता से
उठाए बल्कि विकसित
देशों पर दबाव
भी बनाएं और
उर्जा के
वैकल्पिक
स्त्रोतों की
ओर विश्व को
ले जाने का
वातावरण
बनाएं।
परन्तु गांधी
कहते हैं कि
जो सही है उसे
भारत जैसे देश
को स्वयं
स्वीकार कर
लेना चाहिए।
उदाहरण के लिए
आज भारत की हर
नदी प्रदूषित
है, हर शहर
की वायु
प्रदूषित है, शहरों व
गांवांे में
गंदगी के ढ़ेर
लगे हैं। इन
सबसे नुकसान
भारत व
भारतीयों को
ही अधिकतम है।
कितनी ही
बीमारियां
इनके कारण हैं
तो क्या हमें
इन्तजार करना
है कि कोई
अंतरराष्ट्रीय
मंच कहे तो हम
इसे ठीक करें
या हमे स्वयं
अपने भले के
लिए इसे ठीक
करना चाहिए।
गांधी तो यही
कहते हैं कि
हमें स्वयं
इसे ठीक करना
होगा तथा हमे
ऐसा उदाहरण
दूसरे देशों
के समक्ष रखना
चाहिए कि वे
भी अपने
दृष्टिकोण को
ठीक करने को
प्रेरित हों।
गांधीजी
मानते थे कि
हर व्यक्ति व
इकाई को अपने
से कमजोर की
सहायता करनी
चाहिए अतः सभी
विकसित
राष्ट्रों व भारत-चीन
जैसे देशों का
यह
उत्तरदायित्व
बनता है कि वे
स्वयं तो
पर्यावरण
संरक्षक का
कार्य करे ही
साथ ही साथ
अविकसित
राष्ट्रों को
इस कार्य में
सहायता दें।
यह सहायता धन, तकनीक व
प्रशिक्षण के
रूप में हो
सकती है। गांधीजी
का मत था कि
बड़े उद्योगों
के साथ हमें
छोटे उद्योगों
और
ग्रामोद्योगों
को भी अवश्य
स्थान देना
चाहिए। यह तो
हमारी योजना
का एक आवश्यक
अंग होना
चाहिए
क्योंकि इस
गरीब देश में अधिक
से अधिक लोगों
को रोजगार
देकर गरीब
बेरोजगारों
को रोजी-रोटी
उपलब्ध कराने
हेतु यह अत्यधिक
जरूरी है।
गांधीजी
ने हमेशा सरल
जीवन और उच्च
विचार का
संदेश दिया।
उनका मानना था
कि प्रकृति
मानव की
आवश्यकताओं
की पूर्ति कर
सकती है, लेकिन उसके
लालच को नहीं।
यह विचार आज
के उपभोक्तावादी
समाज के लिए
एक
महत्वपूर्ण
चेतावनी है।
यदि मनुष्य
अपनी
आवश्यकताओं
को सीमित रखे
और संसाधनों
का संतुलित
उपयोग करे, तो
पर्यावरण को
सुरक्षित रखा
जा सकता है।
गांधीवादी
दर्शन में
अहिंसा और
सत्य के
साथ-साथ प्रकृति
के प्रति
सम्मान भी
शामिल है।
पर्यावरण का
अंधाधुंध
दोहन भी एक
प्रकार की
हिंसा ही है।
गांधीजी के
अनुसार, हमें
प्रकृति के
साथ सामंजस्य
स्थापित करना चाहिए, न कि उस पर
प्रभुत्व
जमाने का
प्रयास करना
चाहिए। उनका
ग्राम स्वराज
का सिद्धांत
भी पर्यावरण
संरक्षण से
जुड़ा हुआ है, जिसमें
स्थानीय
संसाधनों का
उपयोग और
आत्मनिर्भरता
पर बल दिया
गया है।
आज की
पर्यावरणीय
समस्याएँ
जैसे जलवायु
परिवर्तन, प्रदूषण, वन कटाई और जैव
विविधता का
ह्रासकृइन
सभी का समाधान
गांधीवादी
सोच में निहित
है। यदि हम
पुनः सादगी, पुनर्चक्रण
और सतत विकास को
अपनाएँ, तो
पर्यावरण की
रक्षा संभव
है।
निष्कर्ष
यह कहा
जा सकता है कि
गांधी की
शिक्षा
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर
पर्यावरण
संरक्षण के
लिए अत्यन्त
उपयोगी है।
यदि
अंतरराष्ट्रीय
जगत के सभी
देश गांधी की
शिक्षा को
अपना कर उसका
अनुसरण करे तो
पर्यावरण
करना व
प्रदूषण को
रोकना
अत्यन्त ही
आसान होगा।
यदि सभी देश
जो दूसरो से
चाहते हैं वह
स्वयं करें, अपनी
जिम्मेदारी
वहन करें व यह
ना देखें कि
दूसरे कर रहे
हैं या नहीं
तथा अपने में
कमजोर
राष्ट्रों की
पर्यावरण
सुरक्षा में
मदद करें तो
एक बेहतर भविष्य
सुनिश्चित
होगा ।
सन्दर्भ
सूची
1. श्री
सिद्धराज
ढड्ढ़ा:
‘‘वैकल्पिक
समाज रचना‘‘, सर्व
सेवा संघ
प्रकाषन, वाराणसी
2. नन्दा, बी. आर.
महात्मा
गाँधील ए
बायोग्राफी, लंदन, जार्ज
ऐलन एण्ड
अनविजन,
1958
3. कृपलानी, जे. बी.:
गाँधीयन थाट, गाँधी
स्माकर निधि, नई
दिल्ली,
1949
4. एम.के. गाँधी:
‘‘आत्मकथा‘‘, सस्ता
साहित्य
मण्डल, नई दिल्ली, 1940
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‘‘गाँधी
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साहित्य
मण्डल, नई दिल्ली, 1950
6. एम.के. गाँधी:
‘‘धर्म नीति‘‘, सस्ता
साहित्य
मण्डल, नई दिल्ली, 1947
7. एम.के. गाँधी:
‘‘मेरा धर्म‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद, 1958
8. एम.के. गाँधी:
‘‘रचनात्मक
कार्यक्रम‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद, 1951
9. एम.के. गाँधी:
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प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद, 1959
10. एम.के. गाँधी:
‘‘माई रिलीजीन‘‘, नवजीवन
प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद, 1955
11. एम.के. गाँधी:
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प्रकाशन
मण्डल, अहमदाबाद, 1947
12. एम.के. गाँधी:
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प्रकाशन
मण्डल, राजघाट, वाराणसी,
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13. एम.के. गाँधी:
‘‘सर्वोदय‘‘, सस्ता
साहित्य
मण्डल, नई दिल्ली, 1952
14. एम.के. गाँधी:
‘‘स्वराज्य
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साहित्य
मण्डल, नई दिल्ली, 1955
15. एम.के. गाँधी:
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