पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन: आधुनिक अभिशासन का एक भारतीय मॉडल

 

डॉ. अशोक कुमार महला1* , डॉ. केशर सिहं शेखावत2

1. सहायक आचार्य, राजनीति विज्ञान, राजकीय कला महाविद्यालय, सीकर (राज.), भारत

drashokmahala@gmail.com

2. सहायक आचार्य, लोकप्रशासन, राजकीय कला महाविद्यालय, सीकर (राज.), भारत

सारांश: प्रस्तुत शोध-पत्र लोक प्रशासन और अभिशासन की कार्यप्रणाली में पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘एकात्म मानवदर्शन’ के अनुप्रयुक्त योगदान का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 20वीं शताब्दी के औपनिवेशिक, पूँजीवादी और समाजवादी प्रशासनिक मॉडलों से इतर, एकात्म मानवदर्शन व्यक्ति, समाज, प्रकृति और राज्य के बीच एक संतुलित, गैर-द्वंद्ववादी व परस्पर-संबद्ध संबंध का प्रस्ताव रखता है। यह अध्ययन अभिशासन के केंद्र में ‘अंतिम जन’ (अंत्योदय) को स्थापित करते हुए अधिकार-केंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था के स्थान पर कर्तव्य-आधारित, मूल्य-निष्ठ और समाज-सापेक्ष शासन व्यवस्था का गहन विश्लेषण करता है। शोध की मौलिकता और प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि यह इस भारतीय दर्शन को समकालीन प्रशासनिक सुधारों-विशेष रूप से क्षमता निर्माण कार्यक्रम ‘मिशन कर्मयोगी’, नीति आयोग के ‘आकांक्षी जिला कार्यक्रम’, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण तथा विकेंद्रीकृत स्थानीय अभिशासन के सामाजिक प्रभावों के साथ एकीकृत करता है। अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि एकात्म मानवदर्शन केवल एक अमूर्त विचार न होकर आधुनिक सुशासन, पर्यावरण-सम्मत विकास और समाज-केंद्रित लोक प्रशासन का अनिवार्य सैद्धांतिक व कार्यात्मक स्तंभ है।

मुख्य शब्द: एकात्म मानवदर्शन, अंत्योदय, अभिशासन, धर्म-राज्य, स्वदेशी, विकेंद्रीकृत अभिशासन, मिशन कर्मयोगी, कर्तव्य-बोध, लोक सेवा मूल्य, सामाजिक परिवर्तन, नागरिक सहभागिता, सार्वजनिक नीति, क्षमता निर्माण, जन-आकांक्षाएँ, प्रशासनिक दक्षता, नीति क्रियान्वयन, सतत विकास।

1. प्रस्तावना

औपनिवेशिक प्रशासनिक विरासत और विकल्प की आवश्यकता

लोक प्रशासन और अभिशासन की संरचना किसी भी राष्ट्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक जड़ों से गहराई से जुड़ी होती है। भारत में स्वतंत्र्योत्तर प्रशासनिक व्यवस्था का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि वर्ष 1947 में सत्ता हस्तांतरण के पश्चात भी भारत ने मुख्य रूप से ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक नौकरशाही के वेबरवादी मॉडल को स्वीकार कर लिया। मैकालेवादी और वेस्टमिंस्टर प्रणाली पर आधारित यह प्रशासनिक ढाँचा नियम-बद्धता, औपचारिकता, तटस्थता और यांत्रिकता पर अत्यधिक बल देता था, जिससे प्रशासन और आम समाज के बीच एक गुणात्मक दूरी बनी रही।

20वीं सदी के वैश्विक परिदृश्य पर प्रभावी दो प्रमुख विचारधाराओं- पश्चिमी पूँजीवाद और राज्य-नियंत्रित समाजवाद ने मनुष्य को मुख्य रूप से एक ‘आर्थिक इकाई’ के रूप में देखा। पूँजीवाद ने व्यक्तिवादी स्वार्थ और बाजार की शक्तियों को प्राथमिकता दी, जिससे सामाजिक असमानता और पर्यावरण क्षरण बढाया वहीं समाजवाद ने राज्य के सर्वाधिकारवाद को बढ़ावा दिया, जिससे व्यक्तिगत स्वायत्तता और सामाजिक पहल क्षमता प्रभावित हुई। इन दोनों प्रणालियों ने प्रशासनिक संगठन के भीतर नागरिक और प्रशासक दोनों को प्रणाली का एक ‘यांत्रिक पूर्जा’ माना। भारतीय परिप्रेक्ष्य में, जहाँ समाज की संरचना अत्यधिक विविधतापूर्ण, ग्रामीण और सामूहिकतावादी है, एक ऐसे प्रशासनिक दर्शन की आवश्यकता सदैव महसूस की गई जो समाज की वास्तविक जड़ों से उपजा हो और लोक-कल्याण को साध्य बना सके।

एकात्म मानवदर्शन का वैचारिक उद्भव-

इस ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने वर्ष 1965 में ‘एकात्म मानवदर्शन’ का प्रतिपादन किया। एकात्म मानवदर्शन भारतीय जीवन-मूल्यों से अनुप्राणित एक ऐसा समग्र दर्शन है, जो व्यक्ति और समाज के बीच किसी भी प्रकार के वर्ग-संघर्ष को नकारता है। उन्होंने प्रतिपादित किया कि मनुष्य केवल एक शरीर या आर्थिक प्राणी नहीं है, बल्कि वह ‘शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा’ का एक एकीकृत समुच्चय है।

प्रशासनिक दृष्टि से, यह दर्शन केवल आर्थिक आंकड़ों या जीडीपी वृद्धि को शासन का अंतिम लक्ष्य नहीं मानता, बल्कि मानव जीवन के चार पुरुषार्थों-धर्म (नैतिकता/कानून), अर्थ (आर्थिक साधन), काम (इच्छाएँ/सुख) और मोक्ष (आत्म-साक्षात्कार) के बीच एक संतुलित व्यवस्था स्थापित करने पर बल देता है। यहाँ ‘धर्म’ को संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था का नियामक माना गया है, जिसका सीधा अर्थ ‘सदाचार, सार्वजनिक कर्तव्य, प्रशासनिक जवाबदेही और सर्वजन हिताय’ से है।

अध्ययन का उद्देश्य एवं लोक प्रशासन में प्रासंगिकता

वर्तमान में जब विश्व और भारत सुशासन, समावेशी विकास, सतत विकास लक्ष्यों और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में प्रयासरत हैं, तब एकात्म मानवदर्शन का अध्ययन अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। इस शोध-पत्र का मुख्य उद्देश्य लोक प्रशासन के सैद्धांतिक व कार्यात्मक ढाँचे में एकात्म मानवदर्शन के योगदान का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। यह अध्ययन यह विश्लेषित करता है कि किस प्रकार ‘अंत्योदय’ और ‘धर्म-राज्य’ की अवधारणाएँ आधुनिक नौकरशाही को अधिक मानवीय, संवेदनशील और समाज-प्रतिबद्ध बना सकती हैं।

शोध परिकल्पनाएँ-

अध्ययन के सैद्धांतिक विश्लेषण, तार्किक परीक्षण एवं समकालीन प्रशासनिक प्रवृत्तियों के मूल्यांकन हेतु निम्नलिखित परिकल्पनाओं का निर्माण किया गया है-

·         H1 (प्रशासनिक प्रासंगिकता)- एकात्म मानवदर्शन आधुनिक प्रशासन को अधिक मानवीय, मूल्य-निष्ठ और संवेदनशील बनाता है।

·         H2 (पारस्परिक संबंध)- व्यक्ति, समाज और राज्य का एकात्म (जैविक) संबंध प्रशासनिक विमुखता को समाप्त कर जन-सहभागिता बढ़ाता है।

·         H3 (सामाजिक प्रासंगिकता)- एकात्म मानवदर्शन भारतीय सामाजिक परिवेश में समरसता, समावेशी विकास और अंत्योदय को सुदृढ़ करता है।

2. एकात्म मानवदर्शन का सैद्धांतिक ढाँचा और प्रशासनिक आयाम

व्यक्ति, समाज और राज्य का एकात्म संबंध

पश्चिमी प्रशासनिक चिंतन में अक्सर व्यक्ति और समाज के हितों को एक-दूसरे के विपरीत देखा गया है। थॉमस हॉब्स, जॉन लॉक और रूसो के ‘सामाजिक अनुबंध सिद्धांत’ की यह मूल मान्यता रही है कि राज्य का निर्माण व्यक्तियों ने अपने अधिकारों की रक्षा हेतु एक समझौते के तहत किया है। इसके विपरीत, एकात्म मानवदर्शन समाज को एक कृत्रिम समझौता न मानकर एक ‘जैविक अंग’ मानता है।

एकात्म दर्शन के अनुसार, व्यक्ति से लेकर परमेष्टि (ब्रह्मांड) के बीच एक परस्पर-संबद्ध और विस्तृत होती हुई चेतना का संबंध है, जहाँ व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। लोक प्रशासन के संदर्भ में, इस जैविक दृष्टिकोण का अर्थ यह है कि प्रशासनिक तंत्र समाज से अलग कोई नियंत्रणकारी संस्था नहीं है, बल्कि वह समाज का ही एक अभिन्न सेवक है। जब प्रशासन स्वयं को समाज का अंग मानता है, तो नौकरशाही का ‘अहंकार’ और ‘विमुखता’ समाप्त होती है, और उसके स्थान पर ‘जन-सेवा’ तथा ‘सहानुभूति’ का प्रादुर्भाव होता है।

‘धर्म-राज्य’ का प्रशासनिक स्वरूप

दीनदयाल उपाध्याय ने राज्य को सर्वोपरि मानने वाले सिद्धांतों का खंडन किया और ‘धर्म-राज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की। यहाँ ‘धर्म-राज्य’ का तात्पर्य किसी सम्प्रदाय विशेष के शासन से नहीं है, बल्कि इसका सीधा अर्थ ‘विधि का शासन’ और ‘नैतिक अभिशासन’ से है।

प्रशासनिक धरातल पर धर्म-राज्य की प्रमुख विशेषताएँ-

1.         सम्प्रभुता धर्म में निहित है- राज्य या सरकार निरंकुश नहीं हो सकती, यहाँ तक कि बहुमत से चुनी गई सरकार भी यदि नैतिकता और जन-कल्याण के विरुद्ध कार्य करती है, तो वह प्रशासनिक रूप से अमान्य है।

2.         लोक सेवकों हेतु धर्म- लोक सेवकों के संदर्भ में ‘धर्म’ का अर्थ उनकी कार्य-नैतिकता, निष्पक्षता, पारदर्शी व्यवहार और सार्वजनिक हित के प्रति पूर्ण समर्पण है।

3.         अधिकारों पर कर्तव्यों की प्राथमिकता- यह सिद्धांत बल देता है कि यदि नागरिक और प्रशासक दोनों अपने-अपने ‘धर्म’ (कर्तव्य) का ईमानदारी से पालन करें, तो समाज में सभी के अधिकारों की रक्षा स्वतः हो जाती है।

3. सामाजिक व्यवस्था और नीति-क्रियान्वयन का व्यावहारिक परिदृश्य

‘अंत्योदय’ और सामाजिक सशक्तीकरण का मॉडल

एकात्म मानवदर्शन का सबसे सशक्त प्रशासनिक आयाम ‘अंत्योदय’ का सिद्धांत है। अंत्योदय का सीधा अर्थ है- “विकास और प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकता में समाज के सबसे निचले और वंचित पायदान पर खड़े व्यक्ति को सबसे पहले स्थान देना।“

प्रशासनिक चिंतन में जॉन रॉल्स के ‘न्याय के सिद्धांत’ में जो स्थान ‘अंतर सिद्धांत’ को प्राप्त है, वही स्थान भारतीय लोक प्रशासन में अंत्योदय को प्राप्त है। पारंपरिक आर्थिक मॉडल में विकास का प्रभाव ऊपर से नीचे की उम्मीद की जाती थी, जो सामाजिक परिणामों के दृष्टिकोण से पूरी तरह खरी नहीं उतरी। अंत्योदय इस दृष्टिकोण को पलट देता है।

प्रशासनिक क्रियान्वयन में अंत्योदय का सामाजिक प्रभाव-

1.         लक्षित लोक-कल्याण- विकास योजनाओं का निर्माण औसत वर्ग को ध्यान में रखकर न करके, सबसे निर्धन और असहाय नागरिक की प्राथमिक आवश्यकताओं को केंद्र में रखकर किया जाता है।

2.         मध्यस्थों का उन्मूलन और पारदर्शिता- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और जनधन-आधार-मोबाइल जैसी प्रौद्योगिकियों के माध्यम से प्रशासनिक तंत्र ने सामाजिक सहायता को सीधे लाभार्थी तक पहुँचाकर अनधिकृत मध्यस्थों के हस्तक्षेप को समाप्त किया है।

3.         आत्मनिर्भरता और सामाजिक स्वावलंबन- अंत्योदय लाभार्थी को केवल एक ‘याचक’ या ‘कृपा-पात्र’ नहीं मानता, बल्कि आजीविका, कौशल विकास और स्वरोजगार की योजनाओं (जैसे- स्व-सहायता समूह, मुद्रा योजना) के माध्यम से उसका सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण करता है।

स्वदेशी, संस्थागत विकेंद्रीकरण और सामुदायिक सहभागिता

एकात्म मानवदर्शन में ‘स्वदेशी’ केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, यह प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और संस्थागत स्वावलंबन का सिद्धांत है। अत्यधिक केंद्रीयकरण को लोक प्रशासन में जन-आकांक्षाओं के दमन का कारण माना गया है।

 

1.         लक्षित लोक-कल्याण- विकास योजनाओं का निर्माण औसत वर्ग को ध्यान में रखकर न करके, सबसे निर्धन और असहाय नागरिक की प्राथमिक आवश्यकताओं को केंद्र में रखकर किया जाता है।

2.         मध्यस्थों का उन्मूलन और पारदर्शिता- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और जनधन-आधार-मोबाइल जैसी प्रौद्योगिकियों के माध्यम से प्रशासनिक तंत्र ने सामाजिक सहायता को सीधे लाभार्थी तक पहुँचाकर अनधिकृत मध्यस्थों के हस्तक्षेप को समाप्त किया है।

3.         आत्मनिर्भरता और सामाजिक स्वावलंबन- अंत्योदय लाभार्थी को केवल एक ‘याचक’ या ‘कृपा-पात्र’ नहीं मानता, बल्कि आजीविका, कौशल विकास और स्वरोजगार की योजनाओं (जैसे- स्व-सहायता समूह, मुद्रा योजना) के माध्यम से उसका सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण करता है।

स्वदेशी, संस्थागत विकेंद्रीकरण और सामुदायिक सहभागिता-

एकात्म मानवदर्शन में ‘स्वदेशी’ केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, यह प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और संस्थागत स्वावलंबन का सिद्धांत है। अत्यधिक केंद्रीयकरण को लोक प्रशासन में जन-आकांक्षाओं के दमन का कारण माना गया है।

मिशन कर्मयोगी के प्रमुख घटक

एकात्म मानवदर्शन और सामाजिक अनुप्रयोग

1. ‘नियम-आधारित’ से ‘भूमिका-आधारित’ परिवर्तन

1. नौकरशाहों को केवल यांत्रिक नियमों का पालन करने के स्थान पर अपनी क्षमताओं का प्रयोग कर सामाजिक समस्याओं को हल करने हेतु प्रेरित करना।

2. व्यवहारिक क्षमताएँ।

2. लोक सेवकों में तकनीकी दक्षता के साथ-साथ संवेदनशीलता, जन-सहानुभूति और नागरिक- अनुकूल दृष्टिकोण का विकास करना।

3. सतत-अधिगम

(iGOT-Karmayogi)

3. लोक सेवकों को बदलती सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप लगातार अपने ज्ञान और कौशल को अद्यतन करने का अवसर देना।

 

यह पहल लोक सेवक के दृष्टिकोण को एक ‘शासक’ से बदलकर समाज के ‘कर्मयोगी’ सेवक के रूप में रूपांतरित करती है।

आकांक्षी जिला कार्यक्रम

नीति आयोग द्वारा संचालित यह कार्यक्रम अंत्योदय का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें देश के सबसे पिछड़े और वंचित जिलों की पहचान कर वहाँ स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि और बुनियादी ढांचे पर विशेष प्रशासनिक ध्यान केंद्रित किया जाता है। इसने प्रशासनिक तंत्र की प्राथमिकताओं को ‘औसत विकास’ से हटाकर ‘अंतिम क्षेत्र के विकास’ पर केंद्रित किया है।

प्रशासनिक चुनौतियाँ एवं नीतिगत विश्लेषण-

लोक प्रशासन के क्षेत्र में एकात्म मानवदर्शन के क्रियान्वयन की समीक्षा करने पर कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी उभरकर आती हैं-

1.         संस्थागत प्रतिरोध और पारंपरिक मानसिकता- एकात्म दर्शन उच्च नैतिक मूल्यों की अपेक्षा करता है। परंतु वेबरवादी नौकरशाही का औपनिवेशिक मिजाज, निहित राजनीतिक दबाव, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार इन आदर्शों के मार्ग में बाधा उत्पन्न करते हैं।

2.         वैश्वीकरण और बाजार की जटिलता- 21वीं सदी के वैश्वीकृत वातावरण में, जहाँ बहुराष्ट्रीय निगम और जटिल वित्तीय तंत्र प्रभावी हैं, स्वदेशी और अत्यधिक विकेंद्रीकृत मॉडल को वैश्विक व्यापार पद्धतियों के साथ संतुलित करना एक कठिन प्रशासनिक कार्य है।

3.         वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन का अभाव- ‘सेवा-भाव’, ‘धर्म’ या ‘संवेदनशीलता’ जैसे गुणात्मक सामाजिक-प्रशासनिक मूल्यों को मापने या लोक सेवकों के प्रदर्शन मूल्यांकन में इन्हें वस्तुनिष्ठ रूप से दर्ज करने का कोई सर्वमान्य पैमाना अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है।

इसके बावजूद, नवीन लोक प्रशासन और आधुनिक प्रशासनिक विचारक यह स्वीकार करते हैं कि केवल बाजार या कानूनी सख्ती से सुशासन संभव नहीं है, इसके लिए सामाजिक पूँजी, नागरिक सहभागिता और नैतिक प्रशासनिक मूल्यों की अनिवार्य आवश्यकता है।

4. निष्कर्ष

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानवदर्शन केवल एक राजनीतिक या दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि यह लोक प्रशासन को औपनिवेशिक और यांत्रिक सोच से मुक्त करने वाला एक सशक्त और समाज-केंद्रित मॉडल है।

पारंपरिक प्रशासनिक सिद्धांतों ने जहाँ व्यवस्था को केवल अधिकार, नियम और संरचनात्मक नियंत्रण के चश्मे से देखा, वहीं एकात्म मानवदर्शन इसे कर्तव्य, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संतुलन और जन-सेवा के माध्यम के रूप में पुनर्परिभाषित करता है।

समकालीन भारत में नीति-निर्माण का ध्यान ‘अंतिम जन के कल्याण’, ‘नागरिक कर्तव्यों’ और ‘प्रशासनिक दक्षता’ पर केंद्रित है, जहाँ एकात्म मानवदर्शन लोक प्रशासन को स्पष्ट दिशा प्रदान करता है। यह दर्शन यह सिद्ध करता है कि एक सफल प्रशासनिक व्यवस्था वही है जो फाइलों और नियमों के जाल से बाहर निकलकर समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के जीवन में वास्तविक, सकारात्मक और स्थायी बदलाव ला सके।

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