विकसित भारत में साहित्य की भूमिका एवं योगदान: एक अध्ययन

Authors

  • राजेन्द्र कुमार पिवहरे सहायक प्राध्यापक(हिन्दी), शासकीय महाविद्यालय वेंकटनगर, अनूपपुर(म. प्र.)

DOI:

https://doi.org/10.29070/ms3r2d79

Keywords:

विकसित भारत, साहित्यिक योगदान, सामाजिक परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण, युवा साहित्य, पंचायत साहित्य, डिजिटल साहित्य

Abstract

यह शोध-पत्र भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और बौद्धिक विकास में साहित्य के ऐतिहासिक और समकालीन योगदान की बहुआयामी समीक्षा प्रस्तुत करता है। ‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टिकोण के संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि साहित्य केवल विचारों और संवेदनाओं का वाहक नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा के प्रसार, महिला सशक्तिकरण, लोकतांत्रिक मूल्यों और नवाचार की प्रेरणा का स्रोत भी रहा है। साहित्यिक आंदोलनों ने समय-समय पर सामाजिक कुरीतियों, अन्याय और असमानताओं के विरुद्ध जनचेतना को जागृत किया, वहीं ग्राम स्तरीय साहित्यिक पहलों ने स्थानीय स्तर पर शिक्षा और जागरूकता को प्रोत्साहन दिया। समकालीन रचनाएँ वर्तमान समाज की जटिलताओं को उजागर कर नई पीढ़ी में आलोचनात्मक चिंतन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को जागृत कर रही हैं। विशेष रूप से युवाओं पर साहित्य का गहरा प्रभाव देखने को मिला है, जिससे उनके भीतर संवेदनशीलता, भाषा कौशल और नेतृत्व क्षमता का विकास हुआ है। साथ ही, डिजिटल माध्यमों के माध्यम से साहित्य का स्वरूप और पहुंच दोनों विस्तृत हुए हैं, जिससे विविध भाषाओं और हाशिये पर पड़े समुदायों को भी अभिव्यक्ति का सशक्त मंच प्राप्त हुआ है। इस प्रकार, साहित्य न केवल भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, बल्कि ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में एक सशक्त प्रेरक तत्व भी सिद्ध होता है।

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Published

2025-04-01

How to Cite

[1]
“विकसित भारत में साहित्य की भूमिका एवं योगदान: एक अध्ययन”, JASRAE, vol. 22, no. 3, pp. 392–401, Apr. 2025, doi: 10.29070/ms3r2d79.

How to Cite

[1]
“विकसित भारत में साहित्य की भूमिका एवं योगदान: एक अध्ययन”, JASRAE, vol. 22, no. 3, pp. 392–401, Apr. 2025, doi: 10.29070/ms3r2d79.