नैतिक जटिलता और अस्पष्टता समकालीन महिला साहित्य में नैतिक दुविधाओं को आकार देने में नायक की भूमिका

Authors

  • शाइनी जोस एस आर शोधार्थी, सनराइज़ यूनिवर्सिटी, अलवर, राजस्थान Author
  • डॉ. राजीव कुमार ओझा प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, सनराइज़ यूनिवर्सिटी, अलवर, राजस्थान Author

DOI:

https://doi.org/10.29070/v2d86412

Keywords:

नैतिक जटिलता, नैतिक दुविधा, समकालीन महिला साहित्य, नायक, सामाजिक संघर्ष, नैतिक अस्पष्टता, महिला साहित्य

Abstract

समकालीन महिला साहित्य में नैतिक जटिलता और अस्पष्टता के विषय पर चर्चा करते हुए, यह अध्ययन यह समझने का प्रयास करता है कि महिला नायक नैतिक दुविधाओं को कैसे आकार देती हैं। नैतिक जटिलता और अस्पष्टता समाज के नैतिक ढांचे को चुनौती देती है और महिलाओं के अनुभवों को एक नए दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता पैदा करती है। समकालीन महिला साहित्य में नायिकाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि वे न केवल अपने व्यक्तिगत संघर्षों का सामना करती हैं बल्कि समाज की स्थापित नैतिक मान्यताओं के खिलाफ सवाल भी उठाती हैं। नायिकाओं की भूमिका इन दुविधाओं को उजागर करने में मदद करती है और उनके माध्यम से पाठकों को यह समझने का मौका मिलता है कि नैतिक निर्णयों के बीच की सीमाएँ अक्सर धुंधली और अस्पष्ट होती हैं। यह अध्ययन नायिकाओं के माध्यम से नैतिक दुविधाओं और जटिलताओं को उजागर करने का प्रयास करेगा और यह देखेगा कि समकालीन महिला साहित्य में इन दुविधाओं का चित्रण समाज में महिला पात्रों की भूमिका को कैसे पुनर्परिभाषित करता है। विश्लेषण महिला नायिकाओं के चरित्र, उनके संघर्षों और उनकी मानसिकता को समझने की कोशिश करेगा, साथ ही यह भी दिखाएगा कि ये नायिकाएँ सामाजिक और नैतिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कैसे करती हैं।

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Published

2026-04-01

How to Cite

[1]
“नैतिक जटिलता और अस्पष्टता समकालीन महिला साहित्य में नैतिक दुविधाओं को आकार देने में नायक की भूमिका”, JASRAE, vol. 23, no. 2, pp. 605–612, Apr. 2026, doi: 10.29070/v2d86412.