भारत की आर्थिक समस्याओं का गांधीवादी समाधान
DOI:
https://doi.org/10.29070/fb98p463Keywords:
गांधीवादी अर्थशास्त्र, आत्मनिर्भरता, अमृतकाल, स्वर्णिम युग, विकासशील राष्ट्र, विकसित राष्ट्र, सत्य, अहिंसा, अर्थ-दर्शन, मिश्रित अर्थ-दर्शन, अपरिग्रह, ट्रस्टीशिप, कल्याणकारी राज्य, सर्वोदय, जनतांत्रिक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था, स्वदेशी, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संकट , उपभोक्तावादAbstract
भारत विश्व की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत एक विकासशील देश है जो तीव्र आर्थिक प्रगति के साथ आगे बढ़ रहा है। परन्तु इसके सामने अनेक आर्थिक समस्याएँ विद्यमान हैं। भारत के विभिन्न आर्थिक समस्याओं के व्यापक प्रयास व्यक्तिगत स्तर और शासकीय स्तर पर लगातार किए जा रहे हैं, परंतु इसके साथ-साथ गांधीवादी विकल्प एक श्रेष्ठ प्रयास सिद्ध हो सकता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए गांधी के विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक और उपयोगी माने जाते हैं। गांधीवादी अर्थशास्त्र नैतिकता, आत्मनिर्भरता और समानता पर आधारित है। गांधीवादी अर्थशास्त्र का केंद्र “मानव कल्याण” है, न कि मात्र उत्पादन और लाभ। गांधीवादी विचारधारा एक वैकल्पिक और टिकाऊ मार्ग प्रस्तुत करती है क्योंकि गांधी का आर्थिक चिंतन केवल धन-संपत्ति के उत्पादन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह नैतिकता, सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों पर आधारित था।
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