भारतीय बहुभाषिक समाज में हिंदी की संपर्क भाषा के रूप में उपयोगिता

Authors

  • डॉ. अरविन्द सिंह तेजावत सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, हरियाणा Author

DOI:

https://doi.org/10.29070/6ydg2616

Keywords:

संपर्क भाषा, बहुभाषिकता, जनगणना 2011, भाषा-प्रसार, कोड-मिश्रण, बाज़ारू हिंदी, आंतरिक प्रवसन, त्रिभाषा सूत्र, भाषिक अस्मिता

Abstract

भारत विश्व के सर्वाधिक बहुभाषिक राष्ट्रों में से एक है, जहाँ 121 भाषाएँ तथा 270 से अधिक मातृभाषाएँ प्रचलन में हैं। ऐसे परिवेश में अंतर-क्षेत्रीय संप्रेषण के लिए किसी संपर्क भाषा की आवश्यकता अपरिहार्य हो जाती है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य यह परीक्षण करना है कि हिंदी इस भूमिका का निर्वाह किस सीमा तक और किन कारणों से कर पा रही है। अध्ययन में संपर्क भाषा की सैद्धांतिक अवधारणा का विवेचन करते हुए हिंदी की व्यापकता के भौगोलिक, जनसांख्यिकीय, आर्थिक एवं सांस्कृतिक आधारों का विश्लेषण किया गया है। जनगणना 2011 के भाषिक आँकड़ों के आलोक में यह दर्शाया गया है कि हिंदी न केवल सर्वाधिक मातृभाषियों वाली भाषा है, अपितु द्वितीय एवं तृतीय भाषा के रूप में भी उसका प्रसार सर्वाधिक है। अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया है कि हिंदी की संपर्क-भूमिका मुख्यतः अनौपचारिक, स्वतःस्फूर्त एवं बाज़ार-प्रेरित रही है, न कि राज्य-प्रायोजित। चलचित्र, दूरदर्शन, आंतरिक श्रमिक प्रवसन, सेना, रेलवे तथा तीर्थाटन—इन कारकों ने हिंदी को शासकीय प्रयासों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभावी ढंग से प्रसारित किया है। साथ ही अध्ययन उन सीमाओं का भी निष्पक्ष विवेचन करता है जो तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में तथा उच्च-प्रतिष्ठा के प्रकार्यात्मक क्षेत्रों में हिंदी के समक्ष विद्यमान हैं। निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदी की उपयोगिता तभी टिकाऊ रहेगी जब वह आरोपित न होकर स्वैच्छिक बनी रहे।

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Published

2026-07-01

How to Cite

[1]
“भारतीय बहुभाषिक समाज में हिंदी की संपर्क भाषा के रूप में उपयोगिता”, JASRAE, vol. 23, no. 4, pp. 1–12, July 2026, doi: 10.29070/6ydg2616.