राजस्थान प्रांत में लोकगायन की ऐतिहासिक विकास यात्रा
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Keywords:
राजस्थान प्रांत, लोकगायन, ऐतिहासिक विकास, भौगोलिक नाम, संगीतAbstract
राजस्थान का आदिकाल का इतिहास बहुत कुछ अज्ञात है। प्राचीन ग्रंथों में समस्त राजस्थान का कोई भौगोलिक नाम नहीं मिलता। प्राचीनकाल में इसके विभिन्न भूखण्ड अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध थे। संगीत का मुख्य प्रयोजन प्रवृत्ति निवृत्ति नहीं अपितु रसास्वादन या “सद्यः परनिवृत्तिः” है। राजस्थान का इतिहास जितना गौरवशाली है, उसी प्रकार राजस्थान का भूगोल भी अति महत्वपूर्ण है। यह भारत का पश्चिमी सरहदी प्रदेश है। स्वतंत्रता से पूर्व, राजस्थान छोटे-बड़े राज्यों में बंटा हुआ था। संगीत के लिये शास्त्र शब्द शासनात् शास्त्रम् को लेकर प्रस्तुत नहीं हुआ है। अपितु शंसनात् शास्त्रम् को लेकर प्रवृत्त हुआ माना जा सकता है। शंासन का अर्थ है किसी गूढ़ तत्वों का शंसन या प्रतिवादन करने वाले गन्थ ही शास्त्र कहलाते हैं। गीतों के समीकरण में कई पक्षों का सम्मिश्रण अपेक्षित होता है। जहाँ गीत के लिये शब्द प्रथम सीढ़ी है तो स्वर दूसरी सीढ़ी। लय तीसरी सीढ़ी है तो ताल चौथी सीढी। शब्द, स्वर, लय एवं ताल के साथ ही अन्य अनेक पहलू भी गीत को समृद्धता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है,Downloads
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Published
2019-01-01
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Section
Articles
How to Cite
[1]
“राजस्थान प्रांत में लोकगायन की ऐतिहासिक विकास यात्रा: -”, JASRAE, vol. 16, no. 1, pp. 3209–3213, Jan. 2019, Accessed: Aug. 23, 2026. [Online]. Available: https://ignited.in/index.php/jasrae/article/view/10041






