व्यंग्य और साहित्य का समीक्षात्मक अध्ययन

The Role of Satire in Socially Conscious Literature

Authors

  • Chander Mohan Author

Keywords:

व्यंग्य, साहित्यकार, सामाजिक उद्धेश्य, पीड़ा, अनुभूति, यथार्थ रूप, आदर्श रूप, मानव-समान, भाव, चेतना

Abstract

सामाजिक उद्धेश्यों को ध्यान में रखते हुए साहित्य सृजन करने वाला साहित्यकार सहृदय वाला होता है। वह समाज की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर अपनी अनुभूति को शब्द वाणी के माध्यम से तटस्थता से व्यक्त करता है। समाज के यथार्थ रूप को चित्रित करते हुए आदर्श रूप को भी अपनाता है। साहित्य मानव-समान के विविध भावों एवं नित नवीन रहने वाली चेतना की अभिव्यक्ति है। साहित्य का सफर किसी भी व्यक्ति के लिए सुगम नहीं होता। उसे विविध परिस्थितियों से जुझना पड़ता है। इसी साहित्य कर्म को और अधिक रोचक बनाने में व्यंग्य भी अपनी भूमिका निभाता है।

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Published

2019-03-01

How to Cite

[1]
“व्यंग्य और साहित्य का समीक्षात्मक अध्ययन: The Role of Satire in Socially Conscious Literature”, JASRAE, vol. 16, no. 4, pp. 110–112, Mar. 2019, Accessed: Mar. 13, 2026. [Online]. Available: https://ignited.in/index.php/jasrae/article/view/10409