प्रेमचंद ‘आदर्श’ और ‘यथार्थ’

प्रेमचंद का साहित्य: स्वाधीनता और सामाजिक भूमिका

Authors

  • Dr. Asha Tiwari Ojha Author

Keywords:

प्रेमचंद, सोजेवतन, प्रतिबंध, साहित्य, स्वाधीनता

Abstract

‘सोजेवतन’ 1909 में प्रकाशित हुआ था। प्रकाशन के साथ ही यह विवादों में आ गया। अंग्रेजी -राज ने ‘सोजेवतन’ पर प्रतिबंध लगा दिया और उनकी प्रतियों को जब्त कर जला दिया। इस प्रतिबंध और जलाने की घटना ने प्रेमचंद को और ज्यादा लोकप्रिय बनाया। प्रेमचन्द जनता के और नजदीक गए। नजदीक जाने के इस क्रम में प्रेमचन्द साहित्य की सामाजिक भूमिका और स्वाधीनता आंदोलन उसके गहरे जुड़ाव को समझ रहे थे। इसी समझ ने प्रेमचन्द के भीतर स्वाधीनता के भाव भरे और ‘‘अपनी स्वाधीनता का हामी लेखक, समाज के प्रति उत्तरदायित्व को भी खूब पहचानता है, क्योंकि वह जानता है कि समाज के संघर्ष से ही उसे यह स्वाधीनता मिली है और वह साधारण जनता की स्वाधीनता का एक अंग है।’’[1] ‘‘इसीलिए’’ ‘‘स्वाधीनता का आन्दोलन जितना ही फैलता गया और जनता के दिमाग में इसकी जड़ें जितनी ही गहरी धँसती गई, प्रेमचन्द की कला उतनी ही जीवन्त और अर्थवान होती गई। उनके अफसाने और उपन्यास एक आईना है, जिसमें आप हिन्दूस्तान की कौमी तवारीख़ के सबसे यादगार दौर के मुख़्तलिफ पहलुओं को, उनकी तमाम अच्छाइयों और कमियों के साथ, प्रतिबिम्बित होता हुआ देख सकते है।”[2]

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Published

2019-05-01

How to Cite

[1]
“प्रेमचंद ‘आदर्श’ और ‘यथार्थ’: प्रेमचंद का साहित्य: स्वाधीनता और सामाजिक भूमिका”, JASRAE, vol. 16, no. 6, pp. 3112–3118, May 2019, Accessed: Apr. 04, 2026. [Online]. Available: https://ignited.in/index.php/jasrae/article/view/11888