कबीर के भक्ति काव्य का नैतिक स्वरूप

Exploring the Ethical Nature of Kabir's Devotional Poetry in the Context of Human Life and Sant Literature

Authors

  • Reena Saroha Author
  • Dr. Rajesh Kumar Author

Keywords:

कबीर, भक्ति काव्य, नैतिक स्वरूप, चार पुरुषार्थ, मानव-जीवन, नीति, मानवता, संत साहित्य, तत्व, मर्यादा

Abstract

भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की परिकल्पना की गई है। मनुष्य का जीवन इन चार पुरुषार्थों से सुमेलित होता है। ये चारों पुरुषार्थ जीवन का एक भाग न होकर समग्र आदर्श जीवन के साध्य रूप हैं। इन्हीं को संधानित करके मानव-जीवन अग्रसर होता है। मानवीय जीवन में नीति का भी अनन्य साधारण महत्व है। वही हमें उचित-अनुचित का ज्ञान देती हुई चलती है और हमारे चरित्र को आलोकित करती है। इस नीति में ‘मानवता’ नामक तत्व विशेष होता है, और संत साहित्य की प्रमुख विशेषता मानवता ही है। इसका सबसे बड़ा लक्ष्य है- ‘अतीत के अनुभव एवं ज्ञान से वर्तमान की उच्छृंखलताओं एवं अमर्यादाओं को दूर करके मर्यादा की स्थापना करना।’[1] यही मानवता कबीर के काव्य का गौरव है। कबीर मानवीय जीवन को ईश्वर की अमूल्य निधि मानते हैं। कबीर ने निम्न नैतिक तत्वों से चलने का संदेश मनुष्य को दिया है जिससे उसे ईश्वर की प्राप्ति यथासंभव हो सके।

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Published

2019-05-01

How to Cite

[1]
“कबीर के भक्ति काव्य का नैतिक स्वरूप: Exploring the Ethical Nature of Kabir’s Devotional Poetry in the Context of Human Life and Sant Literature”, JASRAE, vol. 16, no. 6, pp. 3287–2392, May 2019, Accessed: Apr. 04, 2026. [Online]. Available: https://ignited.in/index.php/jasrae/article/view/11921